भगवदाश्रम

विनय तथा भक्ति · 3 padas

मेरौ मन अनत कहाँ सुख पावै । जैसें उड़ि जहाज को पच्छी; फिरि जहाज पर आवै । कलम-नैन कौ छाँड़ि महातम, और देव कौं ध्वावै ॥ परम गंग कौं छाँड़ि पियासौ, दुरमति कूप खनावै । जिहिं मधुकर अंबुज-रस चाख्यौ, क्यौं करील-फल भावै । सूरदास-प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै ॥1॥

Pada 1

हमैं नँदनंदन मोल लिये । जम के फंद काटि मुकराए, अभय अजाद किये । भाल तिलक, स्रबननि तुलसीदल, मेटे अंक बिये । मूँड्यौ मूँड़, कंठ बनमाला, मुद्रा चक्र दिये । सब कोउ कहत गुलाम स्याम कौ, सुनत सिरात हिये । सूरदास कों और बड़ौ सुख, जूठनि खाइ जिये ॥2॥

Pada 2

राखौ पति गिरिवर गिरि-धारी ! अब तौ नाथ, रह्यौ कछु नाहिन, उघरत माथ अनाथ पुकारी । बैठी सभा सकल भूपनि की, भीषम-द्रोन-करन व्रतधारी । कहि न सकत कोउ बात बदन पर, इन पतितनि मो अपति बिचारी । पाँडु-कुमार पवन से डोलत, भीम गदा कर तैं महि डारी । रही न पैज प्रबल पारथ की, जब तैं धरम-सुत धरनी हारी । अब तौ नाथ न मेरौ कोई, बिनु श्रीनाथ-मुकुंद-मुरारी । सूरदास अवसर के चूकैं फिरि पछितैहौ देखि उघारी ॥2॥

Pada 3

नाम महिमाभावी