भावी

विनय तथा भक्ति · 4 padas

करी गोपाल की सब होइ । जो अपनौ पुरुषारथ मानत, अति झूठौ है सोइ । साधन, मंत्र, जंत्र, उद्यम, बल, ये सब डारौ धोइ । जो कछु लिखि राखी नँदनंदन, मेटि सकै नहिं कोइ । दुख-सुख, लाभ-अलाभ समुझि तुम, कतहिं मरत हौ रोइ । सूरदास स्वामी करुनामय, स्याम-चरन मन पोइ ॥1॥

Pada 1

होत सो जो रघुनाथ ठटै । पचि-पचि रहैं सिद्ध, साधक, मुनि , तऊ न बढ़ै-घटै । जोगी जोग धरत मन अपनैं अपनैं सिर पर राखि जटै । ध्यान धरत महादेवऽरु ब्रह्मा, तिनहूँ पै न छटै । जती, सती, तापस आराधैं, चारौं बेद रटै । सूरदास भगवंत-भजन बिनु, करम-फाँस न कटै ॥2॥

Pada 2

भावी काहू सौं न टरे । कहँ वह राहु, कहाँ वै रवि ससि, आनि सँयोग परै । मुनि बसिष्ट पंडित अति ज्ञानी, रचि-पचि लगन धरै । तात-मरन, सिय हरन, राम बन-बपुधरि बिपति भरै । रावन जीति कोटि तैंतीसौ, त्रिभुवन राज करै । मृत्युहिं बाँधि कूप मैं राखै, भावी-बस सो मरै । अरजुन के हरि हुते सारथी, सोऊ बन निकरै । द्रुपद-सुता कौ राजसभा, दुस्सासन चीर हरै । हरीचंद सो को जगदाता, सो घर नीच भरै । जौ गृह छाँड़ि देस बहु धावै, तउ सग फिरै । भावी कैं बस तीन लोक हैं, सुर नर देह धरै । सूरदास प्रभु रची सु ह्वै है, को करि सोच मरै ॥3॥

Pada 3

तातैं सेइयै श्री जदुराइ । संपति बिपति, बिपतितैं संपति, देह कौ यहै सुभाइ । तरुवर फूलै, फरै, पतझरै, अपने कालहिं पाइ । सरवर नीर भरै भरि, उमड़ै सूखै खेह उड़ाइ । दुतिया चंद बढ़त ही बाढ़े , घटत-घटत घटि जाइ । सूरदास संपदा-आपदा, जिनि कोऊ पतिआइ ॥4॥

Pada 4

भगवदाश्रमवैराग्य