मान लीला

राधा-कृष्ण · 8 padas

मौहिं छुवौ जनि दूर रहौ जू । जाकौं हृदय लगाइ लयौ है, ताकी वाहँ गहौ जू ॥ तुम सर्वज्ञ और सब मूरख, सो रानी अरु दासी । मैं देखत हिरदय वह बैठी, हम तुमकौ भइँ हाँसी ॥ बाँह गहत कछु सरम न आवति, सुख पावति मन माहीं । सुनहु सूर मो तन यह इकटक,चितवति ,डरपति नाहीं ॥1॥

Pada 1

कहा भई घनि बावरी, कहि तुमहिं सुनाऊँ ॥ तुम तैं को है भावती, जिहिं हृदय बसाऊँ ॥ तुमहिं स्रवन, तुम नैन हौ, तुम प्रान-अधारा । वृथा क्रोध तिय क्यौं करौ, कहि बारंबारा ॥ भुज गहि ताहि बसावहू, जेहि हृदय बतावति । सूरज प्रभु कहैं नागरी, तुम तैं को भावति ॥2॥

Pada 2

पियहिं निरखि प्यारी हँसि दीन्हीं । रीझे स्याम अंग अँग निरखत, हँसि नागरि उर लीन्हौ ॥ आलिंगनदै अधर दसत खँडि, कर गहि चिबुक उठावत । नासा सौं नासा लै जोरत, नैन नैन परसावत ॥ इहिं अँतर प्यारी उर निरख्यौ, झझकि भई तब न्यारी । सूर स्याम मौकौं दिखरावत, उर ल्याए धरि प्यारी ॥3॥

Pada 3

मान करौ तुम और सवाई । कोटि कौ एकै पुनि ह्वै हौ, तुम अरु मोहन माई ॥ मोहन सो सुनि नाम स्रवनहीं, मगन भई सुकुमारी । मान गयौ, रिस गई तुरतहीं, लज्जित भई मन भारी ॥ धाइ मिलौ दूतिका कंठ सौ, धन्य-धन्य कहि बानी । सूर स्याम बन धाम जानिकै, दरसन कौं अतुरानी ॥4॥

Pada 4

चलौ किन मानिनि कुंज-कुटीर । तुब बिनु कुँवर कोटि बनिता तजि, सहत मदन की पीर ॥ गदगद स्वर संभ्रम अति आतुर, स्रवत सुलोचन नीर । ववासि क्वासि बृषभानु नंदिनी, बिलपत बिपिन अधीर ॥ बसी बिसिष, माल ब्यालावहि, पंचानन पिक कीर । मलयज गरल, हुतासन मारुत, साखामृगरिपु चीर ॥ हिय मैं हरषि प्रेम अति आतुर, चतुर चली पिय तीर । सुनि भयभीत बज्र के पिंजर ,सूर सुरति-रनधीर ॥5॥

Pada 5

श्याम नारि कैं बिरह भरे । कबहुँक बैठत कुँज द्रुमनि तर, कबहुँक रहत खरे ॥ कबहुँक तनु की सुरति बिसारत, कबहुँक तनु सुधि आवत । तब नागरि के गुनहि बिचारत, तेइ गुन गनि गावत ॥ कहुँ मुकुट, कहूँ मुरलि रही गिरि, कहूँ कटि पीत पिछौरी । सूर स्याम ऐसी गति भीतर, आइ दूतिका दौरी ॥6॥

Pada 6

धनि बृषभानु-सुता बड़ भागिनि । कहा निहारति अंग-अंग छबि, धण्य स्याम-अनुरागिनि ॥ और त्रिया नख शिख सिंगार सजि, तेरै सहज न पूरैं । रति, रंभा, उरबसी, रमा सी, तोहिं निरखि मन झूरै ॥ ये सब कंत सुहागिनि नाहीं, तू है कंत-पियारी । सूर धन्य तेरी सुंदरता, तोसी और न नारी ॥7॥

Pada 7

सँग राजित बृषभानु कुमारी । कुंज-सदन कुसुमनि सेज्या पर दंपति सोभा भारी ॥ आलम भरे मगन रस दोउ, अंग-अंग प्रति जोहत । मनहूँ गौर स्यामल ससि नव तन, बैठे सन्मुख सोहत ॥ कुंज भवन राधा-मनमोहन, चहूँ पास ब्रजनारी । सूर रहीं लोचन इकटक करि, डारतिं तन मन वारी ॥8॥

Pada 8

कृष्ण गोपिकाखंडिता प्रकरण