खंडिता प्रकरण

राधा-कृष्ण · 7 padas

काहे कौं कहि गए आइहैं, काहैं झूठी सौ हैं खाए । ऐसे मैं नहिं जाने तुमकौं, जे गुन करि तुम प्रगट दिखाए । भली करी यह दरसन दीन्हे, जनम जनम के ताप नसाए । तब चितए हरि नैंकु तिया-तन, इतनैहि सब अपराध समाए ॥ सूरदास सुंदरी सयानी, हँसि लीन्हें पिय अंकम लाए ॥1॥

Pada 1

धीर धरहु फल पावहुगे । अपनेहीं सुख के पिय चाँड़े, कबहूँ तौ बस आवहुगे ॥ हम सौं कहत और की औरै, इन बातनि मन भावहुगे । कबहूँ राधिका मान करैगी, अंतर बिरह जनावहुगे ॥ तब चरित्र हमहीं देखैंगी, जैसें नाच नचावहुगे । सूर स्याम अति चतुर कहावत, चतुराई बिसरावहुगे ॥2॥

Pada 2

मैं हरि सौं हो मान कियौ री । आवत देखि आन बनिता-रत, द्वार कपाट दियौ री ॥ अपनैं हीं कर साँकर सारी, संधिहिं संधि सियौ री ॥ जौ देखौं तौ सेज सुमूरति, काँप्यौ रिसनि हियौ री ॥ जब झुकि चली भवन तैं बाहरि, तव हठि लौटि लियौ री । कहा कहौं कछु कहत न आवे, तहँ गोविंद बियौ री । बिसरि गई सब रोष, हरष मन, पुनि करि मदन जियौ री ॥ सूरदास प्रभु अति रति नागर, छल मुख अमृत पियौ री ॥3॥

Pada 3

नंद-नँदन सुखदायक हैं । नैन सैन दै हरत नारि मन, काम काम-तनु दायक हैं ॥ कबहूँ रैनि बसत काहू कैं, कबहूँ भोर उठि आवत हैं । काहू कौ मन आपु चुरावत, काहू कैं मन भावत हैं ॥ काहू कैं जागत सगरी निसि, काहूँ विरह जगावत हैं । सुनहु सूर जोइ जोइ मन भावै, सोइ सोइ रँग उपजावत हैं ॥4॥

Pada 4

नाना रँग उपजावत स्याम । कोउ रीझति, कोउ खीझति बाम । काहू कैँ निसि बसत बनाइ । काहू मुख छुवै आवत जाइ । बहु नायक ह्वै बिलसत आपु । जाकौ सिव पावत नाहिं जापु । ताकौं ब्रजनारी पति जानैं । कोउ आदरैं, कोउ अपमानैं । काहु सौं कहि आवन साँझ । रहत और नागरि घर माँझ । कबहुँ रैन सब संग बिहात । सुनहु सूर ऐसे नँद-तात ॥5॥

Pada 5

अब जुवतिनि सौं प्रगटे स्याम । अरस-परस सबहिनि यह जानी, हरि लुब्धे सबहिनि कैं धाम ॥ जा दिन जाकैं भवन न आवत, सो मन मैं यह करति बिचार । आजु गए औरहिं काहू कै, रिस पावति, कहि बड़े लबार ॥ यह लीला हरि कैं मन भावत, खंडित बचन कहत सुख होत । साँझ बोल दै जात सूर-प्रभु, ताकैं आवत होत उदोत ॥6॥

Pada 6

राधिका गेह हरि-देह-बासी । और तिय धरनि धर तनु-प्रकासी ॥ ब्रह्म पूरन द्वितीय नहीं कोऊ । राधिका सबै हरि सबै वोऊ । दीप सौं दीप जैसैं उजारी । तैसें ही ब्रह्म घर-घर बिहारी ॥ खंडित बचन हित यह उपाई । कबहुँ कहुँ जात, कहु नहिं कन्हाई । जन्म कौ सुफल हरि यहै पावैं । नारि रस-वचन स्रवननि सुनावैं ॥ सूर-प्रभु अनतहीं गमन कीन्हौं । तहाँ नहिं गए जहँ बचन दीन्हौ ॥7॥

Pada 7

मान लीलामध्यम मान