मध्यम मान

राधा-कृष्ण · 13 padas

स्याम दिया सन्मुख नहिं जोवत । कबहुँ नैन की कोर निहारत, कबहुँ बदन पुनि गोवत । मन मन हँसत त्रसत तनु परगट, सुनत भावती बात । खंडित बचन सुनत प्यारी के पुलक होत सब गात । यह सुख सूरदास कछु जानै, प्रभु अपने कौ भाव । श्रीराधा रिस करति, निरखि मुख तिहिं छवि पर ललचाव ॥1॥

Pada 1

नैन चपलता कहाँ गँवाई । मोसौं कहा दुरावत नागर, नागरि रैनि जगाई ॥ ताहौ कैं रँग अरुन भए है, धनि यह सुंदरताई । मनौ अरुन असमबुज पर बैठै , मत्त भृंग रस पाई ॥ उड़ि न सकत ऐसे मतवारे. लागत पलक जम्हाई । सुनहु सूर यह अंग माधुरी, आलस भरे कन्हाई ॥2॥

Pada 2

यह कहि कै तिय धाम गई । रिसनि भरी नख-सिख लौं प्यारी, जोबन-गर्ब-मई ॥ सखी चलीं गृह देखि दसा यह, हठ करि बैठी जाइ । बोलति नहीं मान करि हरि सौं, हरि अंतर रहे आइ । इहिं अंतर जुवतो सब आईं जहाँ स्याम घर-द्वारैं । प्रिया मान करि बैठि रहि है, रिस करि क्रोध तुम्हारैं ॥ तुम आवत अतिहीं झहरानी, कहा करी चतुराई । सुनत सूर यह बात चकित पिय, अतिहिं गए मुरझाई ॥3॥

Pada 3

नैंकु निकुंज कृपा कर आइयै ॥ अति रिस कृस ह्वैं रही किसोरी, करि मनुहारी मनाइयै ॥ कर कपोल अंतर नहिं पावत, अति उसास तन ताइयै । छूटे चिहुर बदन कुम्हिलानौ, सुहथ सँवारि बनाइयै । इतनौ कहा गाँठि कौ लागत, जौ बातनि सुख पाइयै । रूठेहिं आदर देत सयाने, यहै सूर जस गाइयै ॥4॥

Pada 4

बैठी मानिनी गहि मौन । मनौ सिद्ध समाधि सेवत सुरनि साधे पौन ॥ अचल आसन, पलक तारी, गुफा घूँघट-भौन । रोषही कौ ध्यान धारै, टेक टारै कौन ॥ अबहिं जाइ मनाइ लीजै, अबसि कीजै गौन । सूर के प्रभु जाइ देखौ, चित्त चौंधी जौन ॥5॥

Pada 5

स्यामा तू अति स्यामहिं भावै । बैठत-उठत, चलत ,गौ चारत , तेरी लीला गावै ॥ पीत बरन लखि पीत बसन उर, पीत धातु अँग लावै । चंद्राननि सुनि, मोर चंद्रिका, माथैं मुकुट बनावै ॥ अति अनुराग सैन संभ्रम मिलि, संग परम सुख पावै । बिछुरत तोहिं क्वासि राधा कहि, कुंज-कुंज प्रति धावै ॥ तेरौ चित्र लिखै, अरु निरखै, बासर-बिरह नसावै । सूरदास रस-रासि-रसिक सौं, अंतर क्यौं करि आवै ॥6॥

Pada 6

राधे हरि तेरौ नाम बिचारैं । तुम्हरेइ गुन ग्रंथित करि माला, रसनाकर सौं टारै । लोचन मूँदि ध्यान धरि, दृढ़ करि, पलक न नैंक उघारैं ॥ अंग अंग प्रति रूप माधुरी, उत तैं नहीं बिसारैं ॥ ऐसौ नेम तुम्हारी पिय कैं, कह जिय निठुर तिहारैं । सूर स्याम मनकाम पुरावहु, उठि चलि कहैं हमारैं ॥7॥

Pada 7

कहा तुम इतनैंहि कौं गरबानी ॥ जीवन रूप दिवस दसही कौ, जल अँचुरी कौ जानी । तृन की अगिनि ,धूप की मंदिर, ज्यौं तुषार-कन-पानी । रिसहीं जरति पतंग ज्योति ज्यौं, जानति लाभ न हानी ॥ कर कछु ज्ञानऽभिमान जान दै, हैऽब कौन मति ठानी । तन धन जानि जाम जुग छाया, भूलति कहा अयानी ॥ नवसै नदी चलति मरजादा, सूधियै सिंधु समानी । सूर इतर ऊसर के बरषैं, थौरैं हि जल इतरानी ॥8॥

Pada 8

रहित री मानिनी कान न कीजै । यह जोबन अँजुरी कौ जल है, ज्यौं गुपाल माँगै त्यौं दीजै ॥ छिनुछीनु घटति, बढ़ति नहिं रजनी, ज्यौं ज्यौं कलाचंद्र की छीजै । पूरब पुन्य सुकृत फल तेरौ, काहैं न रूप नैन भरि पीजै ॥ सौंह करति तेरे पाइनि की, ऐसी जियनीदसौ नित जीजै । सूर सु जीवन सफल जगत कौ,बेरी बाँधि बिबस करि लीजै ॥9॥

Pada 9

राधा सखी देखी हरषानी । आतुर स्याम पठाई याकौं, अंतरगत की जानी ॥ वह सोभा निरखत अँग-अँग की,रही निहारि निहारि । चकितदेखि नागरि मुख वाकौ, तुरत सिगारनि सारि । ताहि कह्यौ सुख दै चलि हरि कौं, मैं आवति हौं पाछैं ॥10॥

Pada 10

हरषि स्याम तिय बाँह गही । अपनैं कर सारी अँग साजत , यह इक साध गही ॥ सकुचित नारि बदन मुसुकानि, उतकौं चितै रही । कोक-कला परिपूरन दोऊ, त्रिभुवन और नहीं ॥ कुंज-भवन सँग मिलि दोउ बैठै, सोभा एक चही । सूर स्याम स्यामा सिर बेनी, अपनैं करनि गुही ॥11॥

Pada 11

अतिसय चारू विमल, चंचल ये,पल पिंजरा न समाते । बसे कहूँ सोइ बातसखी, कहि रहे इहाँ किहिं नातै ? सोइ संज्ञा दैखति औरासी, विकल उदास कला तैं ॥ चलि चलि जात निकट स्रवनि के, सकि नाटंक फँदाते । सूरदास अंजन गुन अटके, नतरु कबै उड़ि जाते ॥12॥

Pada 12

धन्य धन्य वृषभानु -कुमारी, गिरिवरधर बस कीन्हे (री) । जोइ जोइ साथ करी पिय की, सो सब उनकौं दीन्हे (री) ॥ तोसी तिया और त्रिभुवन मैं, पुरुष स्याम से नाहीं (री ) । कोक-कला पूरन तुम दोऊ, अब न कहूँ हरि जाहीं ।(री) ॥ ऐसे बस तुम भए परस्पर , मौसौं प्रेम दुरावै (री) । सूर सखी आनंद न सम्हारति, नागरि कंठ लगावै (री) ॥13॥

Pada 13

खंडिता प्रकरणबड़ी मान लीला