राधेहिं स्याम देखी आइ । महा मान दृढ़ाइ बैठी, चितै काँपैं जाइ ॥ रिसहिं रिस भई मगन सुंदरि, स्याम अति अकुलात । चकित ह्वै जकि रहे ठाढ़े, कहि न आवै बात ॥ देखि व्याकुल नंद-नंदन, रूखी करति विचार । सूर दोउ मिलैं, जैसैं, करौ सोइ उपचार ॥1॥
Pada 1
राधा-कृष्ण · 9 padas
राधेहिं स्याम देखी आइ । महा मान दृढ़ाइ बैठी, चितै काँपैं जाइ ॥ रिसहिं रिस भई मगन सुंदरि, स्याम अति अकुलात । चकित ह्वै जकि रहे ठाढ़े, कहि न आवै बात ॥ देखि व्याकुल नंद-नंदन, रूखी करति विचार । सूर दोउ मिलैं, जैसैं, करौ सोइ उपचार ॥1॥
Pada 1
यह ऋतु रूसिबे की नाहीं । बरषत मेघ मेदिनी कैं हित, प्रीतम हरषि मिलाहीं ॥ जेती बेलि ग्रीष्म ऋतु डाहीं, ते तरवर लपटाहीं । जे जल बिनु सरिता ते पूरन, मिलन समुद्रहिं जाही ॥ जोबन धन है दिवस चारि कौ, ज्यौं बदरी की छाहीं । मैं, दंपति-रस-रीति कही है, समुझि चतुर मन माहीं ॥ यह चित धरि री सखी राधिका, दै दूती कौ बाहीं । सूरदास उठि चली री प्यारी, मेरैं सँग पिय पाहीं ॥2॥
Pada 2
तोहि किन रूठन सिखई प्यारी । नवल बैस नव नागरि स्यामा, वे नागर गिरिधारी ॥ सिगरी रैनि मनावति बीती, हा हा करि हौं हारी । एते पर हठ छाँड़ति नाहीं, तू वृषभानु दुलारी ॥ सरद-समय-ससि-दरस समरसर, लागै उन तन भारी । मेटहु त्रास दिखाइ बदन-बिधु, सूर स्याम हितकारी ॥3॥
Pada 3
हर-मुख राधा-राधा बानी । धरिनी परे अचेत नहीं सुधि, सखी देखि अकुलानी ॥ बासर गयौ, रैन इक बीती, बिनु भोहन बिनु पानी । बाहँ पकरि तब सखिनि जगायौ, धनि-धनि सारँगपानी ॥ ह्याँ तुम बिबस भए हौ ऐसे, ह्वाँ तौ वे बिबसानी । सूर बने दोउ नारि पुरुष तुम, दुहुँ की अकथ कहानौ ॥4॥
Pada 4
सुनि री सयानी तिय रूसिबे कौ नेम लियौ, पावस दिननि कोऊ ऐसौ है करत री । दिसि दिसि घटा उठी मिली री पिया सौं रूठी, निडर हियौ है तेरौं नैंकु न सरत री ॥ चलिए री मेरी प्यारी, मौकौं मान देन हारी, प्रानहुँ तैं प्यारे पति धीर न धरत री । सूरदास प्रभु तोहिं दियौ चाहै हित-बित, हँसि क्यौं न मिलै तेरौ नेम है टरत री ॥5॥
Pada 5
बेरस कीजै नाहिं भामिनी, मैं रिस की बात । हौं पठई तोहिं लेन साँवरैं, तोहिं बिनु कछु न सुहात ॥ हा हा करि तेरे पाइँ परति हौं, छिनु छिनु निसि घटि जात । सूर स्याम तेरौ मग जोवत, अति आतुर अकुलात ॥6॥
Pada 6
माधौ, तहाँ बुलाई राधे, जमुना निकट सुसीतल छहियाँ । आछी नीकी कुसुँभी सारी गोरैं तन, चलि हरि पिय पहियाँ ॥ दूती एक गई मोहिनि पै, जाइ कह्यौ यह प्यारी कहियाँ । सूरदास सुनि चतुर राधिका,स्याम रैनि बृंदाबन महियाँ ॥7॥
Pada 7
झूँमक सारी तन गोरैं हो । जगमग रह्यौ जराइ कौ टीकौ, छबि की उठति झकोरैं हो ॥ रत्न जटित के सुभग तर्यौना, मनहुँ जाति रबि भोरैं हो । दुलरी खंठ निरखि पिय इक टक, दृग भए रहैं चकोरैं हो । सूरदास-प्रभु तुम्हरे मिलन खौं, रीझि=रीझि तृन तोरैं हो ॥8॥
Pada 8
राधिका बस्य करि स्याम पाए । बिरह गयो दूरि, जिय हरष हरि के भयौ, सहस मुख निगम जिहिं नेति गायौ ॥ मान तजि मानिनी मैन कौ बल हर्यौ, करत तनु कंत जो त्रास भारी । कोक बिद्या निपुन, स्याम स्यामा बिपुल. कुंज-गृह द्वार ठाढ़े मुरारी ॥ भक्त-हित-हेत अवतार लीला करत, रहत प्रभु तहाँ निजु ध्यान जाकैं । प्रगट प्रभु सूर ब्रजनारि कैं हित बँधे, तेत मन-काम-फल संग ताकैं ॥9॥
Pada 9