वसंतोत्सव

राधा-कृष्ण · 7 padas

झूलत स्याम स्यामा संग । निरखि दंपति अंग सोभा, लजत कोटि अनंग । मंद त्रिविध समीर सीतल, अंग अंग सुगंध । मचत उड़त सुबास सँग, मन रहे मधुकर बंध ॥ तैसिये जमुना सुभग जहँ, रच्यौ रंग हिंडोल । तैसियै बृज-बदू बनि, हरि चितै लोचन कोर ॥ तैसोई बृंदा-बिपिन-घन-कुँज द्वार-बिहार । बिपुल गोपी बिपुल बन गृह, रवन नंदकुमार ॥ नित्य लीला, नित्य आनँद, नित्य मंगल गान । सूर सुर-मुनि मुखनि अस्तुति, धन्य गोपी कान्ह ॥1॥

Pada 1

नित्य धाम बृंदाबन स्याम। नित्य रूप राधा ब्रज-बाम ॥ नित्य रास, जल नित्य बिहार । नित्य मान, खंडिताऽभिसार ॥ ब्रह्म-रूप येई करतार । करन हरन त्रिभुवन येइ सार ॥ नित्य कुंज-सुख नित्य हिंडोर । नित्यहिं त्रिबिध-समीर-झकोर ॥ सदा बसंत रहत जहँ बास । सदा हर्ष,जहँ नहीं उदास ॥ कोकिल कीर सदा तहँ रोर । सदा रूप मन्मथ चितचोर ॥ बिबिध सुमन बन फूले डार । उन्मत मधुकर भ्रमत अपार ॥ नव पल्लव बन सोभा एक । बिहरत हरि सँग सखी अनेक ॥ कुहू कुहू कोकिला सुनाई । सुनि सुनि नारि परम हरषाईं ॥ बार बार सो हरिहिं सुनावति । ऋतु बसंत आयौ समुझावतिं ॥ फागु-चरित-रस साध हमारैं । खेलहिं सब मिलि संग तुम्हारैं ॥ सुनि सुनि सूर स्याम मुसुकाने । ऋतु बसंत आयौ हरषाने ॥2॥

Pada 2

पिय प्यारी केलैं जमुन तीर । भरि केसरि कुमकुम अरु अबीर ॥ घसि मृगमद चंदन अरु गुलाल । रँग भीने अरगज वस्त्र माल ॥ कूजत कोकिल कल हँस मोर । ललितादिक स्यामा एक ओर ॥ बृँदादिक मोहन लई जोर । बाजै ताल मृदंग रबाब घोर ॥ प्रभु हँसि कै गेंदुक दई चलाइ । मुख पट दै राधा गई बचाइ ॥ ललिता पट-मोहन गह्यौ धाइ । पीतांबर मुरली लई छिंड़ाइ ॥ हौं सपथ करौं छाँड़ौ न तोहि । स्यामा जू आज्ञा दई मोहिं ॥ इक निज सहचरि आई बसीठि । सुनी री ललिता तू भई ढीठि ॥ पट छाँड़ि दियौ तब नव किसोर । छबि रीझि सूर तृन दियौं तोर ॥3॥

Pada 3

तेरैं आवैंगे आजु सखी हरि, खेलन कौं फागु री । सगुन सँदेसौ हौं सुन्यौं, तेरै आँगन बोलै काग री ॥ मदनमोहन तेरैं बस माई, सुनि राधे बड़भाग री । बाजत ताल मृदंग ताल मृदंग झाँझ डफ, का सोवै, उठि जाग री ॥ चोवा चंदन लै कुमकुम अरु, केसरि पैयाँ लाग री । सूरदास-प्रभु तुम्हरे दरस कौं, राधा अचल सुहाग री ॥4॥

Pada 4

हरि सँग खेलति हैं सब फाग । इहिं मिस करति प्रगट गोपी,,उर-अंतर कौ अनुराग ॥ सारी पहिरि सुरँग, कसि कंचुकि, काजर दै दै नैन । बनि बनि निकसि-निकसि भईं ठाढ़ी, सुनि माधौ कै बैन ॥ डफ बाँसुरी रुंज अरु महुअरि, बाजत ताल मृदंग । अति आनंद मनोहर बानी, गावत उठति तरंग ॥ एक कोध गोविंद ग्वाल सब, एक कोध ब्रज-नारि । छाँड़ि सकुच सब देतिं परस्पर, अपनी भाई गारि ॥ मिलि दस पाँच अली चली कृष्नहिं, गहि लावतिं अचकाइ । भरि अरगजा अबीर कनक-घट, देतिं सीस तैं नाइ ॥ छिरकतिं सखी कुमकुमा केसरि, भुरकतिं बंदन धूरि । सोभित हैं तनु साँझ-समै-घन , आए हैं मनु पूरि ॥ दसहूँ दिसा भयौ परिपूरन, सूर सुरंग प्रमोद । सुर-बिमान कौतुहल भूले,निरखत स्याम-बनोद ॥5॥

Pada 5

नंद नँदन बृषभानु किसोरी, मोहन राधा खेलत होरी । श्रीबृंदावन अतिहिं उजागर, बरन बरन नव दंपति भोरी ॥ एकनि कर है अगरु कुमकुमा , एकनि कर केसरि लै घोरी । एक अर्थ सौं भाव दिखावति, नाचति तरुनि बाल बृध भोरी ॥ स्यामा उतहिं सकल ब्रज-बनिता, इतहिं स्याम रस रूप लहो री । कंचन की पिचकारी छूटति, छिरकत ज्यौं सचुपावैं गोरी ॥ अतिहिं ग्वाल दधि गोरस माते, गारी देत कहौ न करौ री । करत दुहाइ नंदराइ की, लै जु गयौ कल बल छल जोरी ॥ झुंडनि जोरि रही चंद्रावलि, गोकुल मैं कछु खेल मच्यौ री । सूरदास -प्रभु फगुआ दीजै, चिरजीवौ राधा बर जोरी ॥6॥

Pada 6

गोकुलनाथ बिराजत डोल । संग लिये बृषभानु-नंदिनी, पहिरे नील निचोल ॥ कंचन खचित लाल मनि मोती, हीरा जटित अमोल । झुलवहिं जूथ मिलै ब्रजसुँदरि, हरषित करतिं कलोल ॥ खेलतिं, हँसतिं, परस्पर गावतिं, बोलति मीठे बोल । सूरदास-स्वामी, पिय-प्यारी, झूलत हैं झकझोल ॥7॥

Pada 7

बड़ी मान लीलाअक्रूर ब्रज आगमन