अक्रूर ब्रज आगमन

मथुरा गमन · 8 padas

कंस नृपति अक्रूर बुलाये । बैठि इकंत मंत्र दृढ़ कीन्हौ, दोऊ बंधु मँगाये ॥ कहूँ मल्ल, कहुँ गज दै राखे, कहूँ धनुष, कहुँ वीर । नंद महर के बालक मेरैं करषत रहत सरीर ॥ उनहिं बुलाइ बीच ही मारौ, नगर न आवन पावैं । सूर सुनत अक्रूर कहत, नृप मन-मन मौज बढ़ावै ॥1॥

Pada 1

उत नंदहिं सपनौ भयौ, हरि कहूँ हिराने । बल-मोहन कोउ लै गयौ, सुनि कै बिलखाने ॥ ग्वाल सखा रोवत कहैं, हरि तौ कहुँ नाहीं । संगहि सँग खेलत रहे, यह कहि पछिताहीं ॥ दूत एक संग लै गयौ, बलराम कन्हाई । कहा ठगोरी सी करी, मोहिनी लगाई ॥ वाही के दोउ ह्वै गए, हम देखत ठाढ़े । सूरज प्रभु वै निठुर ह्वै, अतिहिं गए गाढ़ै ॥2॥

Pada 2

सुफलक-सुत हरि दरसन पायौ । रहि न सक्यौ रथ पर सुख-व्याकुल , भयौ वहै मन भायौ ॥ भू पर दौरि निकट हरि आयौ, चरननि चित्त लगायौ । पुलक अंग, लोचन जल-धारा, श्रीपद सिर परसायौ ॥ कृपासिंधु करि कृपा मिले हँसि, लियौ भक्त उर लाइ । सूरदास यह सुख सोइ जानै, कहौं कहा मैं गाइ ॥3॥

Pada 3

चलन चलन स्याम कहत, लैन कोउ आयौ । नंद-भवन भनक सुनी, कंस कहि पठायौ ॥ ब्रज की नारि गृह बिसारि , ब्याकुल उठि धाईं । समाचार बूझन कौं, आतुर ह्वै आईं ॥ प्रीति जानि , हेत मानि, बिलखि बदन ठाढ़ीं । मानहु वै अति विचित्र , चित्र लिखी काढ़ी ॥ ऐसी गति ठौर-ठौर, कहत न बनि आवै । सूर स्याम बिछुरैं , दुख-बिरह काहि भावै ॥4॥

Pada 4

चलत जानि चितवतिं ब्रज-जुबती, मानहु लिखीं चितेरैं । जहाँ सु तहाँ एकटक रहि गईं, फिरत न लोचन फेरैं ॥ बिसरि गई गति भाँति देह की, सुनति न स्रवननि टेरैं । मिलि जु गईं मानौ पै पानी , निबरतिं नहीं निबेरैं ॥ लागीं संग मतंग मत्त ज्यौं, घिरति न कैसैंहुँ घेरैं । सूर प्रेम-आसा अंकुस जिय, वै नहिं इत-उत हेरें ॥5॥

Pada 5

(मेरे) कमलनैन प्राननि तैं प्यारे । इन्है कहा मधुपुरी पठाऊँ, राम कृष्न दोऊ जन बारे ॥ जसुदा कहै सुनौ सुफलक-सुत, मैं इन बहुत दुषनि सौं पारे । ये कहा जानै राज सभा कौं, ये गुरुजन बिप्रहुँ न जुहारे ॥ मथुरा असुर समूह बसत है, कर-कृपान, जोधा हत्यारे । सूरदास ये लरिका दोऊ, इन कब देखे मल्ल-अखारे ॥6॥

Pada 6

जसमति अति हीं भई बिहाल । सुफलक सुत यह तुमहिं बूझियत, हरत हमारे बाल ॥ ये दोऊ भैया जीवन हमरे, कहति रोहिनी रोइ । धरनि गिरत उठति अति ब्याकुल, कहि राखत नहिं कोइ ॥ निठुर भए जब तैं यह आयौ, घरहू आवत नाहिं । सूर कहा नृप पास तुम्हारौ, हम तुम बिनु मरि जाहिं ॥7॥

Pada 7

सुनै हैं स्याम मधुपुरी जात । सकुचनि कहि न सकति काहू सौं, गुप्त हृदय की बात ॥ संकित बचन अनागत कोऊ, कहि जु गयौ अधरात । नींद न परै, घटै नहिं रजनी, कब उठि देखौं प्रात ॥ नंद नँदन तौ ऐसौ लागे, ज्यौ जल पुरइनि पात । सूर स्याम सँग तैं बिछुरत हैं, कब ऐहैं कुसलात ॥8॥

Pada 8

वसंतोत्सवमथुरा प्रयाण