मथुरा प्रयाण

मथुरा गमन · 7 padas

अब नँद गाइ लेहु सँभारि । जो तुम्हारैं आनि बिलमे, दिन चराई चारि ॥ दूध दही खवाइ कीन्हेम बड़ अति प्रतिपारि । दूध दही खवाइ कीन्हे, बड़ अति प्रतिपारि । ये तुम्हारे गुन हृदय तैं; डारिहौं न बिसारि ॥ मातु जसुदा द्वार ठाढ़ी, चलै आँसू ढारि । कह्यौ रहियौ सुचित सौं, यह ज्ञान गुर उर धारि ॥ कौन सुत, को पिता-माता देखि हृदै बिचारि । सूर के प्रभु गवन कीन्हौं, कपट कागद फारि ॥1॥

Pada 1

जबहीं रथ अक्रूर चढ़े । तब रसना हरि नाम भाषि कै, लोचन नीर बढ़े ॥ महरि पुत्र कहि सोर लगायौ, तरु ज्यौं धरनि लुटाइ । देखतिं नारि चित्र सी ठाढ़ी, चितये कुँवर कन्हाइ ॥ इतनैं हि मैं सुख दियौ सबनि कौं, दीन्ही अवधि बताइ । तनक हँसे, हरि मन जुवतिन कौं निठुर ठगौरी लाइ ॥ बोलतिं नहीं रहीं सब ठाढ़ी, स्याम-ठगीं ब्रज नारि । सूर तुरत मधुबन पग धारे, धरनी के हितकारि ॥2॥

Pada 2

रहीं जहाँ सो तहाँ सब ठाढ़ीं । हरि के चलत देखियत ऐसी, मनहु चित्र लिखि काढ़ी ॥ सूखे बदन, स्रवनि नैननि तैं, जल-धारा उर बाढ़ी । कंधनि बाँह धरे चितवतिं मनु, द्रुमनि बेलि दव दाढ़ी ॥ नीरस करि छाँड़ी सुफलक सुत, जैसें दूध बिनु साढ़ी । सूरदास अक्रूर कृपा तैं, सही विपति तन गाढ़ी ॥3॥

Pada 3

बिछुरत श्री ब्रजराज आजु, इनि नैननि की परतीति गई । उड़ि न गए हरि संग तबहिं तैं, ह्वै न गए सखि स्याममई ॥ रूप रसिक लालची कहावत , सो करनी कछुवै न भई । साँचे क्रूर कुटिल यै लोचन, वृथा मीन-छवि छीन लई ॥ अक काहैं जल-मोचत, सोचत, सभौ गए तैं सूल नई । सूरदास याही तैं जड़ भए, पलकनिहूँ हठि दगा दई ॥4॥

Pada 4

आजु रैनि नहिं नींद परी । जागत गिनत गगनके तारे, रसना हटत गोविंद हरी ॥ वह चितवनि, वह रथ की बैठनि, जब अक्रूर की बाहँ गही । चितवति रही ठगीसी ठाढ़ी, कहि न सकति कछु काम दही ॥ इते मान व्याकुल भइ सजनी, आरज पंथहुँ तैं बिडरी । सूरदास-प्रभु जहाँ सिधारे, कितिक दूर मथुरा नगरी ॥5॥

Pada 5

री मोहिं भवन भयानक लागै, माई स्याम बिना । कहि जाइ देखौं भरि लोचन, जसुमति कैं अँगना ॥ को संकट सहाइ करिबे कौं, मेटै बिघन घना । लै गयौ क्रूर अक्रूर साँवरी, ब्रज कौ प्रानधना ॥ काहि उठाइ गोद करि लीजै, करि करि मन मगना । सूरदास मोहन दरसन बिनु, सुख संपति सपना ॥6॥

Pada 6

कहा हौं ऐसै ही मरि जैहौं । इहिं आँगन गोपाल लाल कौ, कबहुँ कि कनिया लैहौं ॥ कब वह मुख बहुरौ देखौंगी, कह वैसो सचुपैहौं । कब मोपै माखन माँगैगे, कब रोटी धरि देहौं ॥ मिलन आस तन-प्रान रहत हैं, दिन दस मारग ज्वैहौं । जौ न सूर अइहैं इते र, जाइ जमुन धसि लैहौं ॥7॥

Pada 7

अक्रूर ब्रज आगमनमथुरा प्रवेश तथा कंस बध