मथुरा प्रवेश तथा कंस बध

मथुरा गमन · 17 padas

बूझत हैं अक्रूरहिं स्याम । तरनि किरनि महलनि पर झाईं, इहै मधुपुरी नाम ॥ स्रवननि सुनत रहत हे जाकौं, सो दरसन भए नैन । कंचन कोट कँगूरनि की छबि , मानौ बैठे मैन ॥ उपवन बन्यौ चहूँधा पुर के, अतिहिं मोकौं भावत । सूर स्याम बलरामहिं पुनि पुनि, कर पल्लवनि दिखावत ॥1॥

Pada 1

मथुरा हरषित आजु भई । ज्यौं जुवती पति आवत सुनि कै, पुलकित अंग मई ॥ नवसत साजि सिंगार सुंदरी, आतुर पंथ निहारति । उड़ति धुजा तनु सुरति बिसारे , अंचल नहीं सँभारति ॥ उरज प्रगट महलनि पर कलसा, लसति पास बन सारी । ऊँचे अटनि छाज की सोभा, सीस उचाइ निहारी ॥ जालरंध्र इकटक मग जोवति, किंकिन कंचन दुर्ग । बेनी लसति कहाँ छबि ऐसी , महलनि चित्रे उर्ग ॥ बाजत नगर बाजने जहँ तहँ, और बजत घरियार । सूर स्याम बनिता ज्यौं चंचल, पग नूपुर झनकार ॥ मथुरा बनिता ज्यौं चंचल, पग नूपुर झनकार ॥2॥

Pada 2

मथुरा पुर मैं सोर पर्‌यौ । गरजत कंस बंस सब साजे, मुख कौ नीर हर्‌यौ ॥ पीरौ भयौ, फेफरी अधरनि, हिरदै अतिहिं डर्‌यौ ॥ नंद महर के सुत दोउ सुनि कै, नारिनि हर्ष सर्‌यौ ॥ कोउ महलनि पर कोउ छजनि पर, कुल लज्जा न कर्‌यौ । कोउ धाई पुर गलिन गलिन ह्वै, काम-धाम बिसर्‌यौ ॥ इंदु बदन नव जलद सुभग तनु, दोउ खग नयन कर्‌यौ । सूर स्याम देखत पुर-नारी, उर-उर प्रेम भर्‌यौ ॥3॥

Pada 3

ढौटा नंद कौ यह री । नाहि जानति बसत ब्रज मैं, प्रगट गोकुल री ॥ धर्‌यौ गिरिवर याम कर जिहिं, सोइ है यह री । दैत्य सब इनहीं सँहारे, आपु-भुज-बल री ॥ ब्रज-घरनि जो करत चोरी, खात माखन री । नंद-घरनी जाहिं बान्यौ, अजिर ऊखल री ॥ सुरभि-ठान लिये बन तैं आवत , सबहिं गुन इन री । सूर-प्रभु ये सबहिं लायक, कंस डरै जिन री ॥4॥

Pada 4

भए सखि नैन सनाथ हमारे । मदनगोपाल देखतहिं सजनी, सब दुख सोक बिसारे ॥ पठये हे सुफलक-सुत गोकुल, लैन सो इहाँ सिधारे ! मल्ल जुद्ध प्रति कंस कुटिल मति, छल करि इहाँ हँकारे ॥ मुष्टिक अरु चानूर सैल सम, सुनियत हैं अति भारे । कोमल कमल समान देखियत, ये जसुमति के बारे ॥ होवे जीति विधाता इनकी, करहु सहाइ सबारे । सूरदास चिर जियहु दुष्ट दलि, दोऊ नंद-दुलारे ॥5॥

Pada 5

धनुषसाला चले नँदलाला । सखा लिए संग प्रभु रंग नाना करत, देव नर कोउ न लखि सकत ख्याला ॥ नृपति के रजक सौं भेंट मग मैं भई, कह्यौ दै बसन हम पहिरि जाहीं । बसन ये नृपति के जासु प्रजा तुम, ये बचन कहत मन डरत नाहीं ॥ एक ही मुष्टिका प्रान ताके गए, लए सब बसन कछु सखनि दीन्हे । आइ दरजी गयौ बोलि ताकौं लयौ, सुभग अँग साजि उन विनय कीन्हे ॥ पुनि सुदामा कह्यौ गेह मम अति निकट, कृपा करि तहाँ हरि चरन धारे । धोइ पद-कमल पुनि हार आगैं धरे, भक्ति दै, तासु सब काज सारे ॥ लिए चंदन बहुरि आनि कुबिजा मिली, स्याम अँग लेप कीन्हौ बनाई ॥ रीझि तिहिं रूप दियौ, अंग सुधौ कियौ, बचन सुभ भाषि निज गृह पठाई । पुनि गए तहाँ जहँ धनुष, बोले सुभट हौंस, जनि मन करौ बन-बिहारी । सूर प्रभु छुवत धनु टूटि धरनी पर्‌यौ, सोर सुनि कंस भयौ भ्रमित भारी ॥6॥

Pada 6

सुनिहि महावत बात हमारी । बार-बार संकर्षन भाषत, लेत नाहिं ह्याँ तौं गज टारी ॥ मेरौ कह्यौ मानि रे मूरख, गज समेत तोहिं डारौं मारी । द्वारै खरे रहे हैं कबके, जानि रे गर्व करहि जिय भारी ॥ न्यारौ करि गयंद तू अजहूँ, जान देहि कै आपु सँभारी । सूरदास प्रभु दुष्ट निकंदन, धरनी भार उतारनकारी ॥7॥

Pada 7

तब रिस कियौ महावत भारि । जौ नहिं आज मारिहौं इनकौं, कंस डारिहै मारि ॥ आँकुस राखि कुंभ पर करष्यौ, हलधर उठे हँकारि । तब हरि पुँछ गह्यौ दच्छिन कर, कँबुक फेरि सिर वारि । पटक्यौ भूमि, फेरि नहिं मटक्यौ, लिन्हीं दंत उपारि ॥ दुहुँ कर दुरद दसन इक इक छबि, सो निरखतिं पुरनारि । सूरदास प्रभु सुर सुखदायक, मार्‌यौ नाग पछारि ॥8॥

Pada 8

एई सुत नँद अहीर के । मार्‌यौ रजक बसन सब लूटे, संग सखा बल वीर के ॥ काँधे धरि दोऊ जन आए , दंत कुबलयापीर के । पसुपति मंडल मध्य मनौ, मनि छीरधि नीरधि नीर के ॥ उड़ि आए तजि हंस मात मनु, मानसरोवर तीर के । सूरदास प्रभु ताप निबारन, हरन संत दुख पीर के ॥9॥

Pada 9

सुनौ हो बीर मुष्टिक चानूर सबै, हमहिं नृप पास नाहिं जान दैहौ । घेरि राखे हमैं, नहीं बूझै तुम्हैं, जगत में कहा उपहास लैहौ ॥ सबै यहै कैहै भली मत तुम पै है, नंद के कुँवर दोउ मल्ल मारे । यहै जस लेहुगे, जान नहिं देहुगे, खौजहीं परे अब तुम हमारे ॥ हम नहीं कहैं तुम मनहिं जौ यह बसी, कहत हौ कहा तौ करौ तैसी । सूर हम तन निरखि देखियै आपुकौं, बात तुम मनहिं यह बसी नैसी ॥10॥

Pada 10

गह्यौ कर स्याम भुज मल्ल अपने धाइ , झटकि लीन्हौ तुरत पटकि धरनी । भटकि अति सब्द भयौ, खटक नृप के हियैं, अटकि प्राननि पर्‌यौ चटक करनी ॥ लटकि निरखन लग्यौ, मटक सब भूलि गइ, हटक करि देउँ इहै लागी। झटकि कुँडल निरखि, अटल ह्वै कै गयौ, गटकि सिल सौं रह्यौ मीच जागी ॥ मल्ल जे जे रहे सबै मारे तुरत, असुर जोधा सबै तेउ सँहारे । धाइ दूतन कह्यौ, कोउ न रह्यौ, सूर बलराम हरि सब पछारे ॥11॥

Pada 11

नवल नंदनंदन रंगभूमि राजैं । स्याम तन, पीत पट मनौ घन में तड़ित, मोर के पंख माथैं बिराजैं ॥ स्रवन कुंडल झलक मनौ चपला चमक, दृग अरुन कमल दल से बिसाला । भौंह सुंदर धनुष, बान सम सिर तिलक, केस कुंचित सोह भृंग माला ॥ हृदय बनमाल, नूपुर चरन लाल, चलत गज चाल, अति बुधि बिराजैं । हंस मानौ मानसर अरुन अंबुज सुभर, निरखि आनंद करि हरषि गाजैं । कुबलया मारि चानूर मुष्टिक पटकि, बीर दोउ कंध जग-दंत धारे । जाइ पहुँचे तहाँ कंस बैठ्यौ जहाँ, गए अवसान प्रभु के निहारे ॥ ढाल तरवारि आगैं धरी रहि गई , महल कौ पंथ खोजत न पावत । लात कैं लगत सिर तैं गयौ मुकुट गिरि, केस गहि लै चले हरि खसावत । चारि भुज धारि तेहिं चारु दरसन दियौ, चारि आयुध चहूँ हाथ लीन्हे । असुर तजि प्रान निरवान पद कौं गयौ, बिमल मति भई प्रभु रूप चीन्हे ॥ देखि यह पुहुप वर्षा करि सुरनि मिलि, सिद्द गंदर्व जय धुनि सुनाई । सूर प्रभु अगम महिमा न कछु कहि परति, सुरनि की गति तुरत असुर पाई ॥12॥

Pada 12

उग्रसेन कौं दियौ हरि राज । आनँद मगन सकल पुरवासी, चँवर डुलावत श्री ब्रजराज ॥ जहाँ तहाँ तैं जादव आए, कंस डरनि जे गए पराइ । मागध सूत करत सब अस्तुति, जै जै श्री जादवराइ ॥ जुग जुग बिरद यहै चलि आयौ, भए बलि के द्वारैं प्रतिहार । सूरदास प्रभु अज अबिनासी, भक्तनि हेत लेत अवतार ।13॥ तब बसुदेव हरषित गात । स्याम रामहिं कंठ लाए,हरषि देवै मात । अमर दिवि दुंदुभी दीन्ही, भयौ जैजैकार । दुष्ट दलि सुख दियौ संतनि, ये बसुदेव कुमार ॥ दुख गयौ बहि हर्ष पूरन, नगर के नर-नारि । भयौ पूरब फल सँपूरन, लह्यौ सुत दैत्यारि ॥ तुरत बिप्रनि बोलि पठये, धेनु कोटि मँगाइ । सूर के प्रभु ब्रह्मपूरन, पाइ हरषै राइ ॥14॥

Pada 13

बसुद्यौ कुल-ब्यौहार बिचारि । हरि हलधर कौं दियौ जनेऊ, करि षटरस ज्यौनारि । जाके स्वास-उसाँस लेत मैं, प्रगट भये श्रुति चार । तिन गायत्री सुनी गर्ग सौं, प्रभु गति अगम अपार ॥ विधि सौं धेनु दई बहु बिप्रनि,सहित सर्वऽलंकार । जदकुल भयौ परम कौतूहल जहँ तहँ गावतिं नार ॥ मातु देवकी परम मुदित ह्वै, देति निछावरि वारि । सूरदास की यहै आसिषा, चिर जयौ नंदकुमार ॥15॥

Pada 14

कुबरी पूरब तप करि राख्यौ । आए स्याम भवन ताहीं कै, नृपति महल सब राख्यौ ॥ प्रथमहिं धनुष तोरि आवत हे, बीच मिली यह धाइ । तिहिं अनुराग बस्य भए ताकैं, सो हित कह्यौ न जाइ ॥ देव-काज करि आवन कहि गए, दीन्हौ रूप अपार । कृपा दृष्टि चितवतहीं श्री भइ, निगम न पावत पार ॥ हम तैं दूरि दीन के पाछैं, ऐसे दीनदयाल । सूर सुरनि करि काज तुरतहीं, आवत तहाँ गोपाल ॥16॥

Pada 15

कियौ सुर-काज गृह चले ताकैं । पुरुष औ नारि कौ भेद भेदा नहीं, कुलिन अकुलीन अवतर्‌यौ काकैं ॥ दास दासी कौन, प्रभु निप्रभु कौन है, अखिल ब्रह्मांड इक रोम जाकैं । भाव साँचौ हृदय जहाँ, हरि तहाँ हैं, कृपा प्रभु की माथ भाग वाकैं ॥ दास दासी स्याम भजनहु तैं जिये, रमा सम भई सो कृष्नदासी । मिली वह सूर प्रभु प्रेम चंदन चरचि, कियौ जप कोटि, तप कोटि कासी ॥17॥

Pada 16

मथुरा दिन-दिन अधिक बिराजै । तेज प्रताप राइ कैसौ कैं, तीनि लोक पर गाजै ॥ पग पग तीरथ कोटिक राजैं, मधि विश्रांति बिराजै । करि अस्नान प्रात जमुना कौ, जनम मरन भय भाजै ॥ बिट्ठल बिपुल बिनोद बिहारन, ब्रज कौ बसिबौ छाजै । सूरदास सेवक उनहीं कौ, कृपा सु गिरधर राजै ॥18॥

Pada 17

मथुरा प्रयाणनंद का ब्रज प्रत्यागमन