नंद का ब्रज प्रत्यागमन

मथुरा गमन · 16 padas

बेगि ब्रज कौं फिरिए नँदराइ । हमहिं तुमहिं सुत तात कौ नातौं, और पर्‌यौ हैं आइ ॥ बहुत कियौ प्रतिपाल हमारौ, सो नहिं जी तैं जाइ । जहाँ रहैं तहँ तहाँ तुम्हारे, डार्‌यौ जनि बिसराइ ॥ जननि जसोदा भेंटि सखा सब, मिलियौ कंठ लगाइ । साधु समाज निगम जिनके गुन, मेरैं गनि न सिराइ । माया मोह मिलन अरु बिछुरन, ऐसै ही जग जाइ । सूर स्याम के निठुर बचन सुनि, रहे नैन जल छाइ ॥1॥

Pada 1

नंद बिदा होइ घोष सिधारौ । बिछुरन मिलन रच्यौ बिधि ऐसौ; यह संकोच निवारौ ॥ कहियौ जाइ जसोदा आगैं, नैंन नीर जनि ढारौ । सेवा करी जानि सुत अपनौ, कियौ प्रतिपाल हमारौ ॥ हमैं तुम्हैं अंतर कछु नाहीं , तुम जिय ज्ञान बिचारौ । सूरदास प्रभु यह बिनती है, उर जनि प्रीति बिसारौ ॥2॥

Pada 2

गोपालराइ हौं न चरन तजि जैहौं । तुमहि छाँड़ि मधुबन मेरे मोहन, कहा जाइ ब्रज लैहौं ॥ कैहौं कहा जाइ जसुमत सौं, जब सन्मुख उठि ऐहै । प्रात समय दधि मथत छाँड़ि कै, काहि कलेऊ दैहै ॥ बारह बरस दियौ हम ढीठौ, यह प्रताप बिनु जाने । अब तुम प्रगट भए बसुद्यौ-सुत गर्ग बचन परमाने ॥ रिपु हति काज सबै कत कीन्हौ, कत आपदा बिनासी । डारि न दियौ कमल कर तैं गिरि, दबि मरते ब्रजवासी ॥ बासर संग सखा सब लीन्हे, टेरि न धेनु चरैहौ । क्यौ रहिहैं मेरे प्रान दरस बिनु, जब संध्या नहिं ऐहौं ॥ ऊरध स्वाँस चरन गति थाकी, नैन नीर मरहाइ । सूर नंद बिछुरत की वेदनि, मो पै कही न जाइ ॥3॥

Pada 3

(मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौं । महरि दौरि आगे जब ऐहै, कहा ताहि मैं कैहौं ॥ माखन मथि राख्यौ ह्वै है तुम हेत, चलौ मेरे बारे । निठुर भए मधुपुरी आइ कै , काहैं असुरनि मारे ॥ सुख पायौ बसुदेव देवकी, अरु सुख सुरनि दियौ । यहै कहत नँद गोप सखा सब, बिदरन चहत हियौ ॥ तब माया जड़ता उपजाई, निठुर भए जदुराइ । सूर नंद परमोधि पठाए, निठुर ठगोरी लाइ ॥4॥

Pada 4

उठे कहि माधौ इतनौ बात । जिते मान सेवा तुम कीन्ही, बदलौ दयौ न जात ॥ पुत्र हेत प्रतिपार कियौ तुम, जैसैं जननी तात ॥ गोकुल बसत हँसत खेलत मोहिं द्यौस न जान्यौ जात ॥ होहु बिदा घर जाहु गुसाईं, माने रहियौ नात । ठाढ़ौ थक्यौ उतर नहि आवै, ज्यौं बयारि बस पात । धकधकात हिय बहुत सूर उठि, चले नंद पछितात ॥5॥

Pada 5

बार-बार मग जोवति माता ब्याकनु मोहन बल-भ्राता ॥ आवत देखि गोप नँद साथा । बिवि बालक बिनु भई अनाथा ॥ धाई धेनु बच्छ ज्यौं ऐसैं । माखन बिना रहे धौं कैसैं ॥ ब्रज-नारी हरषित सब धाईं । महरि जहाँ-तहँ आतुर आईं ॥ हरषित मातु रोहिनी आई । उर भरि जलधर लेउँ कन्हाई ॥ देखे नंद गोप सब देखे । बल मोहन कौं तहाँ न पेखे ॥ आतुर मिलन-काज ब्रज नारी । सूर मधुपुरी रहे मुरारी ॥6॥

Pada 6

उलटि पग कैसैं दीन्हौ नंद । छाँड़े कहाँ उभै सुत मोहन, धिक जीवन मतिमंद ॥ कै तुम धन-जोबन-मद माते, कै तुम छूटे बंद । सुफलक-सुत बैरी भयौ हमकौं, लै गयौ आनँदकंद ॥ राम कृष्न बिनु कैसैं जीजै, कठिन प्रीति कैं फंद । सूरदास मैं भई अभागिन, तुम बिनु गोकुलचंद ॥7॥

Pada 7

दोउ ढोटा गोकुल-नायक मेरे । काहैं नंद छाँड़ि तुम आए, प्रान-जिवन सब केरे ॥ (मेरे) मोहन तुमहिं बिना नहिं जैहौं । महरि दौरि आगे जब ऐहै, कहा ताहि मैं कैहौं ॥ माखन मथि राख्यौ ह्वै है तुम हेत, चलौ मेरे बारे । निठुर भए मधुपुरी आइ कै , काहैं असुरनि मारे ॥ सुख पायौ बसुदेव देवकी, अरु सुख सुरनि दियौ । यहै कहत नँद गोप सखा सब, बिदरन चहत हियौ ॥ तब माया जड़ता उपजाई, निठुर भए जदुराइ । सूर नंद परमोधि पठाए, निठुर ठगोरी लाइ ॥8॥

Pada 8

उठे कहि माधौ इतनौ बात । जिते मान सेवा तुम कीन्ही, बदलौ दयौ न जात ॥ पुत्र हेत प्रतिपार कियौ तुम, जैसैं जननी तात ॥ गोकुल बसत हँसत खेलत मोहिं द्यौस न जान्यौ जात ॥ होहु बिदा घर जाहु गुसाईं, माने रहियौ नात । ठाढ़ौ थक्यौ उतर नहि आवै, ज्यौं बयारि बस पात । धकधकात हिय बहुत सूर उठि, चले नंद पछितात ॥9॥

Pada 9

बार-बार मग जोवति माता ब्याकनु मोहन बल-भ्राता ॥ आवत देखि गोप नँद साथा । बिवि बालक बिनु भई अनाथा ॥ धाई धेनु बच्छ ज्यौं ऐसैं । माखन बिना रहे धौं कैसैं ॥ ब्रज-नारी हरषित सब धाईं । महरि जहाँ-तहँ आतुर आईं ॥ हरषित मातु रोहिनी आई । उर भरि जलधर लेउँ कन्हाई ॥ देखे नंद गोप सब देखे । बल मोहन कौं तहाँ न पेखे ॥ आतुर मिलन-काज ब्रज नारी । सूर मधुपुरी रहे मुरारी ॥10॥

Pada 10

उलटि पग कैसैं दीन्हौ नंद । छाँड़े कहाँ उभै सुत मोहन, धिक जीवन मतिमंद ॥ कै तुम धन-जोबन-मद माते, कै तुम छूटे बंद । सुफलक-सुत बैरी भयौ हमकौं, लै गयौ आनँदकंद ॥ राम कृष्न बिनु कैसैं जीजै, कठिन प्रीति कैं फंद । सूरदास मैं भई अभागिन, तुम बिनु गोकुलचंद ॥11॥

Pada 11

दोउ ढोटा गोकुल-नायक मेरे । काहैं नंद छाँड़ि तुम आए, प्रान-जिवन सब केरे ॥ तिनकैं जात बहुत दुख पायौ, रोर परी इहिं खेरे । गोसुत गाइ फिरत हैं दहुँ दिसि, वै न चरैं तृन घेरे ॥ प्रीति न करी राम दसरथ की, प्रान तजे बिनु हेरैं । सूर नंद सौं कहति जसोदा, प्रबल पाप सब मेरैं ॥12॥

Pada 12

नंद कहौ हो कहँ छाँड़े हरि । लै जु गए जैसैं तुम ह्याँतैं, ल्याए किन वैसहिं आगैं धरि ॥ पालि पोषि मैं किए सयाने, जिन मारे जग मल्ल कंस अरि । अब भए तात देवकी बसुद्यौ, बाँह पकरि ल्याये न न्याव करि । देखौ दूध दही घृत माखन, मैं राखे सब वैसें ही धरि । अब को खाइ नंदनंदन बिनु, गोकुल मनि मथुरा जु गए हरि ॥ श्रीमुख देखन कौं ब्रजवासी, रहे ते घर आँगन मेरैं भरि । सूरदास प्रभु के जु सँदेसे, कहे महर आँसू गदगद करि ॥13॥

Pada 13

जसुदा कान्ह कान्ह कै बूझै । फूटि न गईं तुम्हारी चारौ, कैसैं मारग सूझै ॥ इक तौ जरी जात बिनु देखैं, अब तुम दीन्हौं फूँकि । यह छतिया मेरे कान्ह कुँवर बिनु, फटि न भई द्वे टूक ॥ धिक तुम धिक ये चरन अहौ पति, अध बोलत उठि धाए । सूर स्याम बिछुरन की हम पै, दैन बधाई आए ॥14॥

Pada 14

नर हरि तुमसौं कहा कह्यौ । सुनि सुनि निठुर बचन के कैसैं हृदय रह्यौ ॥ छाँड़ि सनेह चले मंदिर कत, दौरि न चरन गह्यौ । दरकि न गई बज्र की छाती, कत यह सूल सह्यौ ॥ सुरति करत मोहन की बातैं, नैननि नीर बह्यौ । सुधि न रही अति गलित गात भयौ, मनु डसि गयौ अह्यौ ॥ उन्हैं छाँड़ि गोकुल कत आए, चाखन दूध दह्यौ । तजे न प्रान सूर दसरथ लौं, हुतौ जन्म निबह्यौ ॥15॥

Pada 15

कहाँ रह्यौ मेरौ मनमोहन । वह मूरति जिय तैं नहिं बिसरति, अंग अंग सब सोहन ॥ कान्ह बिना गोवैं सब व्याकुल, को ल्यावै भरि दोहन । माखन खात खवावत ग्वालनि, सखा लिए सब गोहन ॥ जब वै लीला सुरति करति हौं, चित चाहत उठि जोहन । सूरदास-प्रभु के बिछुरे तैं, मरियत है अति छोहन ॥16॥

Pada 16

मथुरा प्रवेश तथा कंस बधगोपी बचन तथा ब्रजदशा