गोपी बचन तथा ब्रजदशा

मथुरा गमन · 14 padas

ग्वारनि कही ऐसी जाइ । भए हरि मधुपुरी राजा, बड़े बंस कहाइ ॥ सूत मागध बदत बिरदनि, बरनि बसुद्यौ तात । राज-भूषन अंग भ्राजत, अहिर कहत लजात ॥ मातु पितु बसुदेव दैवै, नंद जसुमति नाहिं । यह सुनत जल नैन ढारत, मींजि कर पछिताहिं ॥ मिली कुबिजा मलै लै कै, सो भई अरधंग । सूरप्रभु बस भए ताकैं, करत नाना रंग ॥1॥

Pada 1

कैसै री यह हरि करिहैं । राधा कौं तजिहै मनमोहन, कहा कंस दासी धरिहैं ॥ कहा कहति वह भइ पटरानी, वै राजा भए जाइ उहाँ । मथुरा बसत लखत नहिं कोऊ, को आयौ, को रहत कहाँ ॥ लाज बेंचि कूबरी बिसाहो, संग न छाँड़ति एक घरी । सूर जाहि परतीति न काहू, मन सिहात यह करनि करी ॥2॥

Pada 2

कुबिजा नहिं तुम देखी है । दधी बेचन जब जाति मधुपुरी, मैं नीकैं करि पेषी है ॥ महल निकट माली की बेटी, देखत जिहिं नर-नारि हँसै । कोटि बार पीतरि जौ दाहौ, कोटि बार जो कहा कसैं ॥ सुनियत ताहि सुंदरी कीन्ही, आपु भए ताकौं राजी । सूर मलै मन जाहि जाहि सौं, ताकौ कहा करै काजी ॥3॥

Pada 3

कोटि करौ तनु प्रकृति न जाइ । ए अहीर वह दासी पुर की, बिधिना जोरी भली मिलाइ ॥ ऐसेन कौं मुख नाउँ न लीजै, कहा करौं कहि आवत मोहिं । स्यामहिं दोष किधौं कुबिजा कौ, यहै कहो मैं बूझति तोहि । स्यामहिं दोष कहा कुबिजा कौ, चेरी चपल नगर उपहास । टेढ़ी टेकि चलति पग धरनी, यह जानै दुख सूरजदास ॥4॥

Pada 4

कंस बध्यौ कुबिजा कैं काज । और नारि हरि कौं न मिली कहूँ, कहा गँवाई लाज ॥ जैसैं काग हँस की संगति, लहसुन संग कपूर । जैसैं कंचन काँच बराबरि, गेरू काम सिंदूर ॥ भोजन साथ सूद्र बाम्हन के, तैसौ उनकौ साथ । सुनहु सूर हरि गाइ चरैया, अब भए कुबिजानाथ ॥5॥

Pada 5

वै कह जानैं पीर पराई । सुंदर स्याम कमल-दल लोचन, हरि हलधर के भाई ॥ मुख मुरली सिर मोर पखौवा, बन बन धेनु चराई । जे जमुना जल, रंग रँगे हैं, अजहुँ न तजत कराई ॥ वहई देखि कूबरी भूले, हम सब गईं बिसराई । सूरज चातक बूँद भई है, हेरत रहे हिराई ॥6॥

Pada 6

तब तैं मिटे सब आनंद । या ब्रज के सब भाग संपदा, लै जु गए नँदनंद ॥ बिह्वल भई जसोदा डोलति, दुखित नंद उपनंद । धेनु नहीं पय स्रवतिं रुचिर मुख, चरतिं नहीं तृण कंध ॥ बिषम बियोग दहत उर सजनी, बाढ़ि रहे दुख दंद । सीतल कौन करै री माई, नाहि इहाँ ब्रजचंद ॥ रथ चढ़ि चले गहे नहिं काहू, चाहि रहीं मतिमंद । सूरदास अब कौन छुड़ावै, परे बिरह कैं फंद ॥7॥

Pada 7

इक दिन नंद चलाई बात । कहत सुनत गुन रामकृष्ण कै, ह्वै आयौ परभात ॥ वैसैंहि भोर भयौ जसुमति कौ, लोचन जल न समात । सुमिरि सनेह बिहरि उर अंतर, ढरि आवत ढरि जात । जद्यपि वै बसुदेव देवकी, हैं निज जननी तात । बार एक मिलि जाहु सूर प्रभु, धाई हू कैं नात ॥8॥

Pada 8

चूक परी हरि की सेवकाई । यह अपराध कहाँ लौं बरनौं,कहि कहि नंद महर पछिताई ॥ कोमल चरन-कमल कंटक कुस, हम उन पै बन गाइ चराई । रंचक दधि के काज जसोदा, बाँधे कान्ह उलूषल लाई ॥ इंद्र-प्रकोप जानि ब्रज राखे, बरुन फांस तैं मोहिं मुकराई । अपने तन-धन-लोभ, कंस-डर, आगैं कै दीन्हे दोउ भाई ॥ निकट बसत कबहूँ न मिलि आयौ, इते मान मेरी निठुराई । सूर अजहुँ नातौ मानत हैं, प्रेम सहित करैं नंद-दुहाई ॥9॥

Pada 9

लै आवहु गोकुल गोपालहिं । पाइँनि परि क्यौं हूँ बिनती करि, छल बल बाहु बिसालहिं ॥ अब की बार नैंकु दिखरावहु, नंद आपने लालहिं । गाइनि गनत ग्वार गोसुत सँग, सिखवत बैन रसालहिं ॥ जद्यपि महाराज सुख संपति, कौन गनै मनि लालहिं । तदपि सूर वै छिन न तजत हैं, वा घुँघची की मालहिं ॥10॥

Pada 10

हौं तौ माई मथुरा ही पै जैहौं । दासी ह्वै बसुदेव राइ की, दरसन देखत रैहौं ॥ राखि एते दिवसनि मोहिं, कहा कियौ तुम नीकौ । सोऊ तौ अक्रूर गए लै, तनक खिलौना जी कौ । मोहि देखि कै लोग हसैंगे, अरु किन कान्ह हँसै । सूर असीस जाइ देहौं, जनि न्हातहु बार खसै ॥11॥

Pada 11

पंथी इतनी कहियौ बात । तुम बिनु इहाँ कुँवर वर मेरे, होत जिते उतपात ॥ बकी अघाशुर टरत न टारे, बालक बनहिं न जात । ब्रज पिंजरी रुधि मानौ राखे, निकसन कौं अकुलात ॥ गोपी गाइ सकल लघु दीरघ, पीत बरन कृस गात । परम अनाथ देखियत तुम बिनु, केहिं अवलंबैं तात ॥ कान्ह कान्ह कै टेरत तब धौं, अब कैसैं जिय मानत । यह व्यवहार आजु लौं हैं ब्रज, कपट नाट छल ठानत ॥ दसहूँ दिसि तैं उदित होत हैं, दावानल के कोट । आँखनि मूँदि रहत सनमुख ह्वै, नाम-कवच दै ओट । ए सब दुष्ट हते हरि जेते, भए एकहीं पेट । सत्वर सूर सहाइ करौ अब, समुझि पुरातन हेट ॥12॥

Pada 12

सँदेसौ देवकी सौं कहियौ । हौं तौ धाइ तिहारे सुत की, मया करत ही रहियौ ॥ जदपि टेव तुम जानतिं उनकी, तऊ मोहिं कहि आवै । प्रात होत मेरे लाल लड़ैतें, माखन रोटी भावै ॥ तेल उबटनौ अरु तातौ जल, ताहि देखि भजि जाते । जोइ जोइ माँगत सोइ सोइ देती, क्रम-क्रम करि कै न्हाते ॥ सूर पथिक सुनि मोहिं रैनि दिन बढ़यौ रहत उर सोच । मेरो अलक लड़ैतो मोहन; ह्वै है करत सँकोच ॥13॥

Pada 13

मेरे कुँवर कान्ह बिनु सब कुछ वैसेहिं धर्‌यौ रहे । को उठि प्रात होत ले माखन, को कर नेति गहै ॥ सूने भवन जसोदा सुत के, गुन गुनि सूल सहै । दिन उठि घर घेरत ही ग्वारिनि, उरहन कोउ न कहै ॥ जो ब्रजमैं आनंद हुतौ, मुनि मनसा हू न गहै । सूरदास स्वामी बिनु गोकुल, कौड़ी हू न लहै ॥14॥

Pada 14

नंद का ब्रज प्रत्यागमनगोपी विरह