गोपी विरह

मथुरा गमन · 57 padas

चलत गुपाल के सब चले । यह प्रीतम सौं प्रीति निरंतर, रहे न अर्ध पले । धीरज पहिल करी चलिबैं की, जैसी करत भले । धीर चलत मेरे नैननि देखे, तिहिं छिनि आँसु हले ॥ आँसु चलत मेरी बलयनि देखे, भए अंग सिथिले । मन चलि रह्यौ हुतौ पहिलैं ही,चले सबै बिमले । एक न चलै प्रान सूरज प्रभु, असलेहु साल सले ॥1॥

Pada 1

करि गए थोरे दिन की प्रीति । कहँ वह प्रीति कहाँ यह बिछुरनि, कहँ मधुबन की रीति ॥ अब की बेर मिलौ मनमोहन, बहुत भई बिपरीत । कैसैं प्रान रहत दरसन बिनु, मनहु गए जुग बीति ॥ कृपा करहु गिरिधर हम ऊपर, प्रेम रह्यौ तन जीति । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु, भईं भुस पर की भीति ॥2॥

Pada 2

प्रीति करि दीन्ही गरैं छुरी । जैसैं बधिक चुगाइ कपट-कन, पाछैं करत बुरी ॥ मुरली मधुर चेप काँपा करि , मोर चंद्र फँदवारि । बंक बिलोकनि लगी, लोभ बस, सकी न पंख पसारि ॥ तरफत गए मधुबन कौं , बहुरि न कीन्ही सार । सूरदास प्रभु संग कल्पतरु, उलटि न बैठी डार ॥3॥

Pada 3

नाथ अनाथिन की सुधि लीजै । गोपी, ग्वाल, गाइ, गोसुत सब, दीन मलीन दिनहिं दिन छीजैं ॥ नैननि जलधारा बाढ़ी अति, बूड़त ब्रज किन कर गहि लीजै ॥ इतनी बिनती सुनहु हमारी, बारक हूँ पतिया लिखि दीजै ॥ चरन कमल दरसन नव नवका, करुनासिंधु जगत जस लीजै । सूरदास प्रभु आस मिलन की, एक बार आवन ब्रज लीजै ॥4॥

Pada 4

देखियत कालिंदी अति कारी । अहौ पथिक कहियौ उन हरि सौं, भयौ बिरह जुर जारी ॥ गिरि-प्रजंक तैं गिरति धरनि धसि, तरंग तरफ तन भारी । तट बारू उपचार चूर, जल-पूर प्रस्वेद पनारी ॥ बिगलित कच कुस काँस कूल पर पंक जु काजल सारी । भौंर भ्रमत अति फिरति भ्रमित गति, निसि दिन दीन दुखारी ॥ निसि दिन चकई पिय जु रटति है, भई मनौ अनुहारी । सूरदास-प्रभु जो जमुना गति, सो गति भई हमारी ॥5॥

Pada 5

परेखौ कौन बोल कौ कीजै । ना हरि जाति न पाँति हमारी, कहा मानि दुख लीजै ॥ नाहि न मोर-चंद्रिका माथैं, नाहि न उर बनमाल । नहिं सोभित पुहुपनि के भूषन, सुंदर स्याम तमाल ॥ नंद-नँदन गोपी-जन-वल्लभ, अब नहिं कान्ह कहावत । बासुदेव, जादवकुल-दीपक, बंदी जन बरनावत ॥ बिसर्‌यौ सुख नातौ गोकुल को, और हमारे अंग । सूर स्याम वह गई सगाई , वा मुरली कैं संग ॥6॥

Pada 6

अब वै बातैं उलटि गईं । जिन बातनि लागत सुख आली, तेऊ दुसह भई ॥ रजनी स्याम सुंदर सँग, अरु पावस की गरजनि । सुख समूह की अवधि माधुरी, पिय रस बस की तरजनि ॥ मोर पुकार गुहार कोकिला , अलि गुंजार सुहाई । अब लागति पुकार दादुर सम, बिनही कुँवर कन्हाई । चंदन चंद समीर अगिन सम, तनहिं देत दव लाई । कालिंदी अरु कमल कुसुम सब, दरसन ही दुखदाई ॥ सरद बसंत सिसिर अरु ग्रीषम, हिम-रितु की अधिकाई । पावस जरैं सूर के प्रभु बिनु, तरफत रैनि बिहाई ॥7॥

Pada 7

मिलि बिछुरन की बेदन न्यारी । जाहि लगै सोई पै जानै, बिरह-पीर अति भारी ॥ जब यह रचना रची बिधाता, तबहीं क्यौं न सँभारी । सूरदास प्रभु काहैं, जिवाई, जनमत ही किन मारी ॥8॥

Pada 8

मधुबन तुम क्यौं रहत हरे । बिरह बियोग स्याम सुंदर के ठाढ़े क्यौं न जरे ॥ मोहन बेनु बनावत तुम तर, साखा टेकि खरे । मोहे थावर अरु जड़ जंगम, मनि जन ध्यान टरे ॥ वह चितवनि तू मन न धरत है, फिरि फिरि पुहुप धरे । सूरदास प्रभु बिरह दवानल, नख सिख लौं न जरे ॥9॥

Pada 9

बहुरौ देखिबौ इहि भाँति । असन बाँटत खात बैठे, बालकन की पाँति ॥ एक दिन नवनीत चोरत, हौं रही दुरि जाइ । निरखि मम छाया भजे, मैं दौरि पकरे धाइ ॥ पोंछि कर मुख लई कनियाँ, तब गई रिस भागि । वह सुरति जिय जाति नाहीं, रहे छाती लागि ॥ जिन घरनि वह सुख बिलोक्यौ, ते लगत अब खान । सूर बिनु ब्रजनाथ देखे, रहत पापी प्रान ॥10॥

Pada 10

कब देखौं इहिं भाँति कन्हाई । मोरनि के चँदवा माथे पर, काँध कामरी लकुट सुहाई ॥ बासर के बीतैं सुरभिन सँग, आवत एक महाछबि पाई । कान अँगुरिया घालि निकट पुर, मोहन राग अहीरी गाई ॥ क्यौं हुँ न रहत प्रान दरसन बिनु, अब कित जतन करै री माई । सूरदास स्वामी नहिं आए, बदि जु गए अवध्यौऽब भराई ॥11॥

Pada 11

गोपालहिं पावौं धौं किहि देस । सिंगी मुद्रा कर खप्पर लै, करिहौं जोगिनि भेस । कंथा पहिरि बिभूती लगाऊँ, जटा बँधाऊँ केस । हरि कारन गोरखहिं जगाऊँ, जैसैं स्वाँग महेस ॥ तन मन जारौं भस्म चढ़ाऊँ, बिरहाके उपदेस । सूर स्याम बिनु हम हैं ऐसी, जैसें मनि बिनु सेस ॥12॥

Pada 12

फिरि ब्रज बसौ गोकुलनाथ । अब न तुमहिं जगाइ पठवैं, गोधननि के साथ ॥ बरजैं न माखन खात कबहूँ, दह्यौ देत लुठाइ । अब न देहिं उराहनौ, नँद-घरनि आगैं जाइ ॥ दौरि दावरि देहिं नहिं, लकुटी जसोदा पानि । चोरि न देहिं उघारि कै, औगुन न कहिहैं आनि ॥ कहिहैं न चरननि देन जावक, गहन बेनी फूल । कहिहैं न करन सिंगार कबहूँ, बसन जमुना कूल ॥ करिहैं न कबहूँ मान हम, हठिहैं न माँगत दान । कहिहैं न मृदु मुरली बजावन, करन तुमसौं गान ॥ देहु दरसन नंद-नंदन, मिलन की जय आस । सूर हरि के रूप कारन, मरत लोचन प्यास ॥13॥

Pada 13

काहैं पीठि दई हरि मोसौं । तुमही पीठि भावते दीन्हौ, और कहा कहि कोसौं ॥ मलि बिछुरै की पीर सखी री, राम सिया पहिचाने । मिलि बिछुरे की पीर सखी री, पय पानि उर आने ॥ मिलि बिछुरे की पीर कठिन है, कहैं न कोऊ मानै । मिलि बिछुरे की पीर सखी री, बिछुर्‌यौ होइ सो जानै ॥ बिछुरे रामचंद्र औ दसरथ, प्रान तजे छिन माहीं । बिछुर्‌यौ पात गिर्‌यौ तरुवर तैं, फिर न लगे उहि ठाहीं ॥ बिछुर्‌यौ हँस काय घटहूँ तैं, फिरि न आव घट माहीं । मैं अपराधिनि जीवत बिछुरी, बिछुर्‌यौ जीवत नाहीं ॥ नाद कुरंग मीन जल बिछुरे, होइ कीट जरि खेहा । स्याम बियोगिनि अतिहिं सखी री, भई साँवरी देहा ॥ गरजि गरजि बादर उनये हैं, बूँदनि बरषत मेहा । सूरदास कहु कैसें निबहै, एक ओर कौ नेहा ॥14॥

Pada 14

बारक जाइयौ मिलि माधौ । को जानै तन छूटि जाइगौ, सूल रहै जिय साधौ ॥ पहुनैंहु नंदबबा के आबहु, देखि लेउँ पल आधौ । मिलैं ही मैं विपरीत करी बिधि, होत दरस कौ बाधौ ॥ सो सुख सिव सनकादि न पावत, जो सुख गोपिन लाधौ । सूरदास राधा बिलपति है, हरि कौ रूप अगाधौ ॥15॥

Pada 15

सखी इन नैननि तैं घन हारे । बिनहीं रितु बरषत निसि बासर, सदा मलिन दोउ तारे ॥ ऊरध स्वास समीर तेज अति, सुख अनेक द्रुम डारे । बदन सदन करि बसे बचन खग, दुख पावस के मारे ॥ दुरि दुरि बूँद परत कंचुकि पर, मिलि अंजन सौं कारे । मानौ परनकुटी सिव कीन्ही, बिबि मूरति धरि न्यारे ॥ घुमरि घुमरि बरषत जल छाँड़त, डर लागत अँधियारे । बूड़त ब्रहह सूर को राखै, बिनु गिरिवर धर प्यारे ॥16॥

Pada 16

निसि दिन बरषत नैन हमारे । सदा रहति बरषा रितु हम पर, जब तैं स्याम सिधारे । दृग अंजन न रहत निसि बासर, कर कपोल भए कारे । कंचुकि-पट सूखत नहिं कबहूँ, उर बिच बहत पनारे ॥ आँसू सलिल सबै भइ काया, पल न जात रिस टारे । सूरदास प्रभु है परेखौ, गोकुल काहैं बिसारे ॥17॥

Pada 17

हर दरसन को तरसति अँखियाँ । झाँकति झखतिं झरोखा बैठी, कर मीड़तिं ज्यौं मखियाँ ॥ बिछुरीं बदन-सुधानिधि-रस तैं, लगतिं नहीं पल पँखियाँ । इकटक चितवतिं उड़ि न सकतिं जनु, थकित भईं लखि सखियाँ ॥ बार-बार सिर धूनतिं बिसूरतिं, बिरह ग्राह जनु भखियाँ । सूर सुरूप मिलै तैं जीवहिं, जीवहिं, काट किनारे नखियाँ ॥18॥

Pada 18

(मेरे) नैना बिरह की बेलि बई । सींचत नैन-नीर के सजनी, मूल पताल गई । बिगसित लता सुभाइ आपनैं, छाया सघन भई । अब कैसैं निरवारौं सजनी , सब तन पसरि छई ॥ को जानै काहू के जिय की, छिन छिन होत नई । सूरदास स्वामी के बिछुरैं, लागी प्रेम जई ॥19॥

Pada 19

ब्रज बसि काके बोल सहौं ॥ इन लोभी नैननि के काजैं, परबस भइ जो रहौं ॥ बिसरि लाज गइ सुधि नहिं तन की, अबधौं कहा कहौं । मेरे जिय मैं ऐसी आवति, जमुना जाइ बहौं ॥ इक बन ढूँढ़ि सकल बन ढूँढ़ौं, कहूँ न स्याम लहौं। सूरदास-प्रभु तुम्हरे दरस कौं, इहिं दुख अधिक दहौं ॥20॥

Pada 20

हो, ता दिन कजरा मैं देहौं । जा दिन नंदनंदन के नैननि, अपने नैन मिलैहौं ॥ सुनि री सखी यहै जिय मेरैं, भूलि न और चितैहौं । अब हठ सूर यहै ब्रत मेरौ, कौकिर खै मरि जैहौं ॥21॥

Pada 21

देखि सखी उत है वह गाउँ । जहाँ बसत नँदलाल हमारे, मोहन मथुरा नाउँ ॥ कालिंदी कैं कूल रहत हैं, परम मनोहे ठाउँ । जौ तब पंख होइँ सुनि सजनी, अबहि उहाँ उड़ि जाउँ ॥ होनी होइ होइ सो अबहीं, इहिं ब्रज अन्न न खाउँ ॥ सूर नंदनंदन सौं हित करि, लोगनि कहा डराउँ ॥22॥

Pada 22

लिखि नहिं पठवत हैं द्वै बोल । द्वै कौड़ी के कागद मसि कौ, लागत है बहु मोल ? हम इहि पार, स्याम पैले तट, बीच बिरह कौ जोर । सूरदास प्रभु हमरे मिलन कौं, हिरदै कियौ कठोर ॥23॥

Pada 23

सुपनैं हरि आए हौं किलकी । नींद जु सौति भई रिपु हमकौं, सहि न सकी रति तिल को । जौ जागौं तौ कोऊ नाहीं, रोके रहति न हिलकी । तन फिरि जरनि भई नख सिख तैं, दिया बाति जनु मिलकी ॥ पहिली दसा पलटि लीन्ही है, त्वचा तचकि तनु पिलको । अब कैसैं सहि जाति हमारी, भई सूर गति सिल की ॥24॥

Pada 24

पिय बिनु नागिनि कारी रात । जौ कहूँ जामिनि उवति जुन्हैया, डसि उलटि ह्वै जात ॥ जंत्र न पूरत मंत्र नहिं लागत, प्रीति सिरानी जात । सूर स्याम बिनु बिकल बिरहनी, मुरि मुरि लहरैं खात ॥25॥

Pada 25

मौकौं माई जमुना जम ह्वै रही । कैसैं मिलीं स्यामसुंदर कौं, बैरिनि बीच बही ॥ कितिक बीच मथुरा अरु गोकुल, आवत हरि जु नहीं । हम अबला कछु मरम न जान्यौ, चलत न फेंट गही ॥ अब पछिताति प्रान दुख पावत, जाति न बात कही । सूरदास प्रभु सुमिरि-सुमिरि गुन, दिन दिन सूल सही ॥26॥

Pada 26

नैन सलोने स्याम, बहुरि कब आवहिंगे । वै जौ देखत राते राते, फुलनि फूली डार । हरि बिनु फूलझरी सी लागत, झरि झरि परत अँगार ॥ फूल बिनन नहिं जाउँ सखी री, हरि बिनु कैसे फूल । सुनि री सखि मोहिं राम दुहाई, लागत फूल त्रिसूल । जब मैं पनघट जाउँ सखि री, वा जमुना कै तीर । भरि भरि जमुना उमड़ि चलति है, इन नैननि कैं नीर ॥ इन नैननि कैं नीर सखी री, सेज भई घरनाउ । चाहति हौं ताही पै चढ़ि कै, हरि जू कैं ढिग जाउँ ॥ लाल पियारे प्रान हमारे, रहे अधर पर आइ । सूरदास प्रभु कुंज-बिहारी, मिलत नहीं क्यौं धाइ ॥27॥

Pada 27

प्रीति करि काहू सुख न लह्यौ । प्रीति पतंग करी पावक सौं, आप प्रान दह्यौ ॥ अलि-सुत प्रीति करी जल-सुत सौं, संपुट मांझ गह्यौ । सारंग प्रीति करी जु नाद सौं, सन्मुख बान सह्यौ ॥ हम जौ प्रीति करी माधव सौं, चलत न कछू कह्यौ ॥ सूरदास प्रभु बिनु दुख पावत, नैननि नीर बह्यौ ॥28॥

Pada 28

प्रीति तौ मरिबौऊ न बिचारै । निरखि पतंग ज्योति-पावक ज्यौं, जरत न आपु सँभारै ॥ प्रीति कुरंग नाद मन मोहित, बधिक निकट ह्वै मारै । प्रीति परेवा उड़त गगन तैं, गिरत न आपु सँभारै । सावन मास पपीहा बोलत, पिय पिय करि जु पुकारै । सूरदास-प्रभु दरसन कारन, ऐसी भाँति बिचारै ॥29॥

Pada 29

जनि कोउ काहू कैं बस होहि । ज्यौ चकई दिनकर बस डोलत, मोहिं फिरावत मोहि ॥ हम तौ रीझि लटू भई लालन, महा प्रेम तिय जानि । बंधन अवधि भ्रमित निसि-बासर, को सुरझावत आनि ॥ उरझे संग अंग अंगनि प्रति, बिरह बेलि की नाईं । मुकुलित कुसुम नैन निद्रा तजि, रूप सुधा सियराई ॥ अति आधीन हीन-मति व्याकुल, कहँ लौं कहौं बनाई । ऐसी प्रीति-रीति रचना पर, सूरदास बलि जाई ॥30॥

Pada 30

हरि परदेस बहुत दिन लाए । कारी घटा देखि बादर की, नैन नीर भरि आए ॥ बीर बटअऊ पंथी हौ तुम, कौन देस तैं आए । यह पाती हमरौ लै दीजौ, जहाँ साँवरै छाए ॥ दादुर मोर पपीहा बोलत, सोवत मदन जगाए । सूर स्याम गोकुल तैं बिछरे, आपुन भए पराए ॥31॥

Pada 31

ये दिन रूसिबे के नाहीं । कारी घटा पौन झकझोरै, लता तरुन लपटाहीं ॥ दादुर मोर चकोर मधुप पिक, बोलत अमृत बानी । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु, बैरिन रितु नियरानी ॥32॥

Pada 32

अब बरषा कौ आगम आयो । ऐसे निठुर भए नँदनंदन, संदैसौ न पठायौ । बादर घेरि उठे चहुँ दिसि तैं, जलधर गरजि सुनायौ । अकै सूल रही मेरैं जिय, बहरि नहीं ब्रज छायौ ॥ दादुर मोर पपीहा बोलत, कोकिल सब्द सुनायौ । सूरदास के प्रभु सौं कहियौ, नैननि है झर लायौ ॥33॥

Pada 33

सँदेसनि मधुबन कूप भरे । अपने तौ पठवत नहिं मोहन, हमरे फिरि न फिरे ॥ जिते पथिक पठए मधुवन कों, बहुरि न सोध करे । कै वै स्याम सिखाइ प्रमोधे, कै कहूँ बीच मरे ॥ कागद गरे मेघ, मसि खूटी, सर दव लागि जरे । सेवक सूर लिखन कौ आँधौ, पलक कपाट अरे ॥34॥

Pada 34

ब्रज पर बदरा आए गाजन । मधुबन को पठए सुनि सजनी, फौज मदन लाग्यौ साजन ॥ ग्रीवा रंध्र नैन चातक जल, पिक मुख बाजे बाजन । चहुँदिसि तैं तन बिरहा घेर्‌यौ, कैसैं पावति भाजन ॥ कहियत हुते स्याम पर पीरक, आए संकट काजन । सूरदास श्रीपति की महिमा, मथुरा लागे राजन ॥35॥

Pada 35

बहुरि हरि आवहिंगे किहि काम । रितु बसंत अरु ग्रीषम बीते, बादर आए स्याम ॥ छिन मंदिर छिन द्वारैं ठाढ़ी, यौं सूखति हैं घाम । तारे गनत गगन के सजनी, बीतैं चारौ जाम ॥ औरौ कथा सबै बिसराई, लेत तुम्हारौ नाम । सूर स्याम ता दिन तैं बिछुरे, अस्थि रहै कै चाम ॥36॥

Pada 36

किधौं घन गरजत नहिं उन देसनि। किधौं हरि हरषि इंद्र हठि बरजे, दादुर खाए सेषनि ॥ किधौं उहिं देस बगनि मग छाँड़े, घरनि न बूँद प्रवेसनि । चातक मोर कोकिला उहिं बन, बधिकनि बधे बिसेषनि ॥ किधौं उहिं देस बाल नहिं झूलतिं, गावतिं सखि न सुदेसनि । सूरदास प्रभु पथिक न चलहीं, कासौं, कहौं सँदेसनि ॥37॥

Pada 37

आजु घन स्याम की अनुहारि । आए उनइ साँवरे सजनी, देखि रूप की आरि ॥ इंद्र धनुष मनु पीत बसन छबि, दामिनि दसन बिचारि । जनु बगपाँति माल मोतिनि की, चितवत चित्त निहारि ॥ गरजत गगन गिरा गोविंद मनु, सुनत नयन भरे वारि । सूरदास गुन सुमिरि स्याम के, बिकल भईं ब्रजनारि ॥38॥

Pada 38

हमारे माई मोरवा बैर परे । घन गरजत बरज्यौ नहिं मानत, त्यौं त्यौं रटत खरे ॥ करि करि प्रगट पंख हरि इनके, लै लै सीस धरे । याही तैं न बदत बिरहनि कौं, मोहन ठीठ करे ॥ को जाने काहे तैं सजनी, हमसौं रहत अरे । सूरदास परदेस बसे हरि, ये बन तैं न टरे ॥39॥

Pada 39

बहुरि पपीहा बौल्यौ माई । नींद गई चिंता चित बाढ़ी, सूरतिस्याम की आई ॥ सावन मास मेघ की बररषा, हौं उठि आँगन आई । चहुँदिसि गगन दामिनी कौंधति, तिहिं जिय अधिक डराई ॥ काहूँ राग मलार अलाप्यौ, मुरलि मधुर सुर गाई । सूरदास बिरहिनि भइ ब्याकुल, धरनि परी मुरझाई ॥40॥

Pada 40

सखी री चातक मोहिं जियावत । जैसेंहि रैनि रटति हौं पिय पिय, तैसैंहि वह पुनि गावत ॥ अतिहिं सुकंठ, दाह प्रीतम कैं, तारू जीभ न लावत । आपुन पियत सुधा-रस अमृत, बोलि बिरहिनी प्यावत ॥ यह पंछी जु सहाइ न होतौ, प्रान महा दुख पावत । जीवन सुफल सूर ताही कौ, काज पराए आवत ॥41॥

Pada 41

कोकिल हरि कौ बोल सुनाउ। मधुबन तैं उपटारि स्याम कौं, इहिं ब्रज कौं लै आउ ॥ जा जस कारन देत सयाने, तन मन धन सब साज । सुजस बिकात बचन के बदलैं, क्यौं न बिसाहतु आज ॥ कीजै कछु उपकार परायौ, इहै सयानौ काज । सूरदास पुनि कहँ यह अवसर, बिनु बसंत रितुराज ॥42॥

Pada 42

अब यह बरषौ बीति गई । जनि सोचहि, सुख मानि सयानी, भली रितु सरद भई ॥ फुल्ल सरोज सरोवर सुंदर, नव बिधि नलिनि नई । उदित चारु चंद्रिका किरन, उर अंतर अमृत मई ॥ घटी घटा अभिमान मोह मद, तमिता तेज हई । सरिता संजम स्वच्छ सलिल सब, फाटी काम कई ॥ यहै सरद संदेस सूर सुनि, करुना कहि पठई । यह सुनि सखी सयानी आईं, हरि-रति अवधि हई ॥43॥

Pada 43

सरद समै हू स्याम न आए । को जानै काहे तैं सजनी, किहिं बैरिनि बिरमाए ॥ अमल अकास कास कुसुमति छिति, लच्छन स्वच्छ जनाए । सर सरिता सागर जल-उज्ज्वल, अति कुल कमल सुहाए ॥ अहि मयंक, मकरंद कंज अलि, दाहक गरज जिबाए । प्रीतम रँग संग मिलि सुंदरि, रचि सचि सींच सिराए ॥ सूनी सेज तुषार जमत चिर, बिरह सिंधु उपजाए । अब गई आस सूर मिलिबे की, भए ब्रजनाथ पराए ॥44॥

Pada 44

दूरि करहि बीना कर धरिबौ । रथ थाक्यौ, मानौ मृग मोहे, नाहिंन होत चंद्र को ढरिबौ ॥ बीतै जाहि सोइ पै जानै, कठिन सु प्रेम पास कौ परिबौ । प्राननाथ संगहिं तैं बिछुरे, रहत न नैन नीर कौ झरिबौ ॥ सीतल चंद अगिन सम लागत, कहिए धीर कौन बिधि धरिबौ । सूर सु कमलनयन के बिछरैं, झूठौ सब जतननि कौ करिबौ ॥45॥

Pada 45

कोउ माई बरजै री या चंदहिं । अति हीं क्रोध करत है हम पर, कुमुदिनि कुल आनंदहिं ॥ कहाँ कहौ बरषा रबि तमचुर, कमल बकाहक कारे । चलत न चपल रहत थिर कै रथ, बिरहिनि के तन जारे ॥ निंदतिं सैल उदधि पन्नग कौं, स्रीपति कमठ कठोरहिं । देतिं असीस जरा देवी कौ, राहु केतु किन जोरहिं ॥ ज्यौं जल-हीन मीन तन तलफतिं, ऐसी गति ब्रजबालहिं । सूरदास अब आनि मिलावहु, मोहन मदन गुपालहिं ॥46॥

Pada 46

माई मोकौं चंद लग्यौ दुख दैन । कहँ वै स्याम कहाँ वै बतियाँ, कहँ वै सुख की रैन ॥ तारे गनत गनत हौं हारी, टपकत लागे नैन । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु, बिरहिनि कौं नहिं चैन ॥47॥

Pada 47

अब या तनहिं राखि कह कीजै । सुनि री सखी स्याम सुंदर बिनु, बाँटि बिषम बिष पीजै ॥ कै गिरिऐ गिरि चढ़ि सुनि सजनी, सीस संकरहि दीजै । कै दहिऐ दारून दावानल, जाइ जमुन धँसि लीजै ॥ दुसह बियोग बिरह माधौ के , कौ दिन ही दिन छीजै । सूर स्याम प्रीतम बिनु राधे, सोचि सोचि कर मींजै ॥48॥

Pada 48

काहे कौं पिय पियहिं रटति हौ, पिय कौ प्रेम तेरो प्रान हरैगौ । काहे कौं लेति नयन जल भरि भरि, नैन भरै कैसैं सूल टरैगौ ॥ काहे कौं स्वास उसास लेति हौ बिरह कौ दबा बरैगौ । छार सुगंध सेज पुहपावलि, हार छुवै, हिय हार जरैगो ॥ बदन दुराइ बैठि मंदिर मैं, बहुरि निसापति उदय करैगौ । सूर सखी अपने इन नैननि, चंद चितै जनि चंद जरैगौ ॥49॥

Pada 49

बिछुरे री मेरे बाल-सँघाती । निकसि न जात प्रान ये पापी, फाटनि नाहिंन छाती ॥ हौं अपराधिनि दही मथति ही, भरी जोबन मदमाती । जौ हौं जानति हरि कौ चलिबौ, लाज छाँड़ि सँग जाती ॥ ढरकत नीर नैन भरि सुंदरि, कछु न सोह दिन-राती । सूरदास प्रभु दरसन कारन , सखियनि मिलि लिखी पाती ॥50॥

Pada 50

एक द्यौस कुंजनि मैं माई । नाना कुसुम लेइ अपनैं कर, दिए मोहिं सो सुरति न जाई ॥ इतने मैं घन गरजि वृष्टि करी, तनु भीज्यौ मो भई जुड़ाई । कंपत देखि उढ़ाइ पीत पट, लै करुनामय कंठ लगाई ॥ कहँ वह प्रीति रीति मोहन की, कहँ अब धौं एती निठुराई । अब बलवीर सूर प्रभु सखि री, मधुबन बसि सब रति बिसराई ॥51॥

Pada 51

मेरे मन इतनी सूल रही । वे बतियाँ छतियाँ लिखि राखीं, जे नँदलाल कही ॥ एक द्यौस मेरैं गृह आए, हौं ही मथत दही । रति माँगत मैं मान कियौ सखि, सो हरि गुसा गही ॥ सोचति अति पछिताति राधिका, मुरछित धरनि ढही । सूरदास प्रभु के बिछुरे तैं, बिथा न जाति सही ॥52॥

Pada 52

हरि कौ मारग दिन प्रति जोवति । चितवत रहत चकोर चंद ज्यौं, सुमिरि-सुमिरि गुन रोवति ॥ पतियाँ पठवति मसि नहिं खूँटति, लिखि लिखि मानहु धोवति । भूख न दिन निसि नींद हिरानी, एकौ पल नहिं सोवति ॥ जे जे बसन स्याम सँग पहिरे, ते अजहूँ नहिं धोवति । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु, बृथा जनम सुख खोवति ॥53॥

Pada 53

इहिं दुख तन तरफत मरि जैहैं । कबहुँ न सखी स्याम-सुंदर घन, मिलिहैं आइ अंक भरि लैहै ? कबहुँ न बहुरि सखा सँग ललना, ललित त्रिभंगी छबिहिं दिखै हैं ? कबहुँ न बेनु अधर धरि मोहन, यह मति लै लै नाम बुलैहैं । कबहुँ न कुंज भवन सँग जैहैं, कबहुँ न दूती लैन पठैहैं ? कबहुँ न पकरि भुजा रस बस ह्वै, कबहुँन पग परि मान मिटैहैं ? याही तै घट प्रान रहत हैं, कबहुँक फिरि दरसन हरि देहैं ? सूरदास परिहरत न यातैं, प्रान तजैं नहिं पिय ब्रज ऐहैं ॥54॥

Pada 54

सबैं सुख ले जु गए ब्रजनाथ । बिलखि बदन चितवतिं मधुबन तन, इस न गईं उठि साथ ॥ वह मूरति चित तैं बिसरति नहिं, देखि साँवरे गात । मदन गोपाल ठगौरी मेली , कहत न आवै बात । नंद-नँदन जु बिदेस गबन कियौ, बैसी मींजतिं हाथ । सूदास प्रभु तुम्हरें बिछुरे, हम सब भईं अनाथ ॥55॥

Pada 55

करिहौ मोहन कहूँ सँभारि, गोकुल-जन सुखहारे । खग, मृग,तृन, बेली वृंदावन, गैया ग्वाल बिसारे ॥ नंद जसोदा मारग जोवैं, निसि दिन दीन दुखारे । छिन छिन सुरति करत चरननि की, बाल बिनोद तुम्हारे ॥ दीन दुखी ब्रज रह्यौ न परि है, सुंदर स्याम ललारे । दीनानाथ कृपा के सागर, सूरदास-प्रभु प्यारे ॥56॥

Pada 56

उनकौ ब्रज बसिबौ नहिं भावै । ह्वाँ वै भुप भए त्रिभवन के, ह्याँ कत ग्वाल कहावैं ॥ ह्वाँ वै छत्र सिंहासन राजत, की बछरनि सँग धावै । ह्वा तौ बिबिधँ वस्त्र पाटंबर, को कमरी सचु पावै ॥ नंद जसोदा हूँ कौ बिसर्‌यौ, हमरी कौन चलावै ॥ सूरदास प्रभु निठुर भए री, पातिहु लिखि न पठावै ॥57॥

Pada 57

गोपी बचन तथा ब्रजदशाउद्धव को ब्रज भेजना