उद्धव को ब्रज भेजना

उद्धव संदेश · 14 padas

अंतरजामी कुंवर कन्हाई । गुरु गृह पढ़त हुते जहँ विद्या, तहँ ब्रज-बासिनि की सुधि आई ॥ गुरु सौं कह्यौ जोरि कर दोऊ, दछिना कहौ सो देउँ मँगाई । गुरु-पतनी कह्यौ पुत्र हमारे, मृतक भये सो देहु जिवाई ॥ आनि दिए गुरु-सुत जमपुर तैं, तब गुरुदेव असीस सुनाई । सूरदास प्रभु आइ मधुपुरी, ऊधौ कौं ब्रज दियौ पठाई ॥1॥

Pada 1

जदुपति जानि उद्धव रीति । जिहिं प्रगट निज सखा कहियत, करत भाव अनीति ॥ बिरह दुख जहँ नाहिं-नैकहूँ, तहँ न उपजै प्रेम । रेख, रूप न बरन जाकैं, इहिं धर्यौ वह नेम ॥ त्रिगुन तन करि लखत हमकौं, ब्रह्म मानत और । बिना गुना क्यौं पुहुमि उघरै, यह करत मन डौर ॥ बिरस रस के मंत्र कहुऐ, क्यौ, चलै संसार । कछु कहत यह एक प्रगटत, अति भर्यौ अहंकार ॥ प्रेम भजन न नैंकु याकौं, जाइ क्यौं समुझाइ । सूर प्रभु मन यहै आनी, ब्रजहिं देउँ पठाइ ॥2॥

Pada 2

संग मिलि कहौं कासौं बात । यह तौ कहत जोग की बातैं, जामै रस जरि जात ॥ कहत कहा पितु मातु कौन के, पुरुष नारि कह नात । कहाँ जसोदा सी है मैया, कहाँ नंद सम तात ॥ कहँ बृषभान-सुता सँग कौ सुख, वह बासर वह प्रात । सखी सखा सुख नहिं त्रिभुवन मैं, नहिं बैकुंठ सुहात ॥ वै बातें कहियै किहिं आगै, यह गुनि हरि पछितात । दूरदास प्रभु ब्रज महिमा कहि, लिकी बदत बल ब्रात ॥3॥

Pada 3

तबहिं उपंग-सुत आइ गए । सखा सखा कछु अंतर नाहीं, भरि भरि अंक लए ॥ अति सुन्दर तन स्याम सरीखो, देखत हरि पछिताने । ऐसे कैं वैसी बुधि होती, ब्रज पठऊँ मन आने ॥ या आगैं रस-कथा प्रकासौं, जोग-कथा प्रगटाऊँ । सूर ज्ञान याकौ दृढ़ करिकै, जुवतिन्ह पास पठाऊँ ॥4॥

Pada 4

हरि गोकुल की प्रीति चलाई । सुनहु उपँग-सुत मोहि न बिसरत, ब्रज बासी सुखदाई ॥ यह चित होत जाऊँ मैं अबहीं, इहाँ नहीं मन लागत । गोपी ग्वाल गाइ बन चारन, अति दुख पायौ त्यागत ॥ कहँ माखन-रोटी, कहँ जहँ जसुमति, जेंवहु कहि-कहि प्रेम । सूर स्याम के बचन हँसत सुनि, थापत अपनौ नेम ॥5॥

Pada 5

जदुपति लख्यौ तिहिं मुसुकात । कहत हम मन रही जोई, भई सोई बात ॥ बचन परगट करन कारन, प्रेम कथा चलाई । सुनहु ऊधौ मोहिं ब्रज की, सुधि नहीं बिसराइ ॥ रैनि सोवत दिवस जागत, नाहिं नै मन आन । नंद-जसुमति, नारि-नर-ब्रज तहाँ मेरौ प्रान ॥ कहत हरि सुनि उपँग सुत यह, कहत हौम रस रीति । सूर चित तैं टरति नाहीं, राधिका की प्रीति ॥6॥

Pada 6

सखा सुनि एक मेरी बात । वह लता गृह संग गोपनि, सुधि करत पछितात ॥ बिधि लिखी नहिं टरत क्यौं हूँ, यह कहत अकुलात । हँसि उपँग-सुत बचन बोले, कहा करि पछितात ॥ सदा हित यह रहत नाहीं, सकल मिथ्या जात । सूरप्रभु एक यह सुनो मोसौं, एक ही सौं नात ॥7॥

Pada 7

जब ऊधौ यह बात कही । तब जदुपति अति ही सुख पायौ, मानी प्रगट सही । श्री मुख कह्यौ जाहु तुम ब्रज कौं, मिलहु जाइ ब्रज-लोग । मो बिनु, बिरह भरीं ब्रजबाला, जाउ सुनावहु जोग ॥ प्रेम मिटाइ ज्ञान परबोधहु, तुम हौ पूरन ज्ञानी । सूर उपंग-सुत मन हरषाने, यह महिमा इन जानी ॥8॥

Pada 8

ऊधौ तुम यह निश्चय जानौ । मन, बच, क्रम, मैं तुमहिं पठावत, ब्रज कौं तुरत पलानौ ॥ पूरन ब्रह्म अकल अविनासी, ताके तुम हौ ज्ञाता । रेख न रूप जाति कुल नाहीं, जाके नहिं पितु माता ॥ यह मत दै गोपिनि कौं आवहु, बिरह नदी मैं भासत । सूर तुरत तुम जाइ कहौ यह, ब्रह्म बिना नहिं आसत ॥9॥

Pada 9

ऊधौ मन अभिमान बढ़ायो । जदुपति जोग जानि जिय साँचौ, नैन अकास चढ़ायौ ॥ नारिनि पै मोकौं पठवत हैं, कहत सिखावन जोग । मन ही मन अप करत प्रसंसा, यह मिथ्या सुख-भोग ॥ आयसु मानि लियौ सिर ऊपर, प्रभु आज्ञा परमान । सूरदास प्रभु गोकुल पठवत, मैं क्यौं हौं कि आन ॥10॥

Pada 10

तुम पठवत गोकुल कै जैहौं । जौ मानिहैं ब्रह्म की बातें, तो उनसौं मै कैहौं ॥ गदगद बचन कहत मन प्रपूलित, बार-बार समझैहौं । आजु नहीं जो करौं काज तुव, कौन काज फुनि लैहौं ॥ यह मिथ्या संसार सदाई, यह कहिकै उठि ऐहौं । सूर दिना द्वै ब्रज-जन सुख दै, आइ चरन पुनि गैहौं ॥11॥

Pada 11

तुरत ब्रज जाहु उपँग-सुत आजु । ज्ञान बुझाइ खबरि दै आवहु , एक पंथ द्वै काज ॥ जब तैं मधुबन कौं हम आए , फेरि गयौ नहिं कोइ । जुवतिनि पै ताही कौं पठवैं, जो तुम लायक होइ ॥ इक प्रवीन अरु सखा हमारे, ज्ञानी तुम सरि कौन । सोइ कीजौ जातैं ब्रज-बाला, साधन सीखैं पौन ॥ श्रीमुख स्याम कहत यह बानी, ऊधौ सुनत सिहात । आयसु मानि सूर प्रभु जैहौं, नारि मानिहैं बात ॥12॥

Pada 12

हलधर कहत प्रीति जसुमति की । कहा रोहिनी इतनी पावै, वह बोलनि अति हित की ॥ एक दिवस हरि खेलत मो सँग, झगरौ कीन्हौ पेलि । मौकौं दौरि गोद करि लीन्हौ, इनहिं दियौ कर ठेलि ॥ नंद बबा तब कान्ह गोद करि, खीजन लागे मोकौं । सूर स्याम नान्हौं तेरौ भैया, छोह न आवत तोकौं ॥13॥

Pada 13

जसुमति करति मोकौं हेत । सुनौ ऊधौ कहत बनत न, नैन भरि-भरि लेत ॥ दुहुँनि कौ कुसलात कहियौ, तुमहिं भूलत नाहिं । स्याम हलधर सुत तुम्हारे, और के न कहाहिं ॥ आइ तुमकौं धाइ मिलिहैं, कछुक कारज और । सूर हमकौ तुम बिना सुख, कौ नहीं कहुँ ठौर ॥14॥

Pada 14

गोपी विरहतीन पाती तथा संदेश