तीन पाती तथा संदेश

उद्धव संदेश · 9 padas

स्याम कर पत्री लिखी बनाइ । नंद बाबा सौं बिनै, कर जोरि जसुदा माइ ॥ गोप ग्वाल सखान कौं हिलि-मिलन कंठ लगाइ । और ब्रज-नर-नारि जे हैं, तिनहिं प्रीति जनाइ ॥ गोपिकनि लिखि जोग पठयो, भाव जानि न जाइ । सूर प्रभु मन और यह कहि, प्रेम लेत दिढ़ाइ ॥15॥

Pada 1

ऊधौ जात ब्रजहिं सुने । देवकी बसुदेव सुनि कै, हृदे हेत गुने ॥ आप सौं पाती लिखी, कहि धन्य जसुमति नंद । सुत हमारे पालि पठए, अति दियौ आनंद ॥ आइकै मिलि जात कबहुँ न , स्याम अरु बलराम । इहौ कहत पठाइहौं अब, तबहिं तन बिस्राम ॥ बाल-सुख सब तुमहिं लूट्यौ, मोहिं मिले कुमार । सूर यह उपकार तुम तैं, कहत बारंबार ॥16॥

Pada 2

हम पर काहैं झुकतिं ब्रजनारी । साझे भाग नहीं काहू कौ, हरि की कृपा निनारी ॥ कुबिजा लिख्यौ सँदेस सबनि कौ, अरु कीन्हीं मनुहारी । हौं तौ दासी कंसराइ की, देखौ मनहिं बिचारी ॥ फलनि माँझ ज्यौं करुइ तोमरी, रहत घुरे पर डारी । अब तौ हाथ परी जंत्री के,, बाजत राग दुलारी ॥ तनुतैं टेढ़ी सब कोउ जानत, परसि भई अधिकारी ॥ सूरदास स्वामी करुनामय, अपने हाथ सँवारी ॥17॥

Pada 3

सुनियत ऊधौ लए सँदेसौ, तुम गोकुल कौं जात । पाछैं करि गोपिनि सौं कहियौ, एक हमारी बात ॥ मातु पिता को नेह समुझि कै, स्याम मधुपुरी आए । नाहिं न कान्ह तुम्हारे प्रीतम, ना जसुदा के जाए ॥ देखौ बूझि आपने जिय मैं, तुम धौं कौन सुख दीन्हे । ये बालक तुम मत्त ग्वालिनी, सबे मूड़ करि लीन्हे ॥ तनक दही माखन के कारन, जसुदा त्रास दिखावै । तुम हँसि सब बाँधन कौं दौरीं, काहू दया न आवै ॥ जो बृषभान-सुता उत कीन्ही, सो सब तुम जिय जानौ ॥ ताहीं जाल तज्यौ ब्रज मोहन, अब काहैं दुख मानौ ॥ सूरदास प्रभु सुनि-सुनि बातैं, रहे भूमि सिर नाए । इत कुबिजा उत प्रेम गोपिकनि, कहत न कछु बनि आए ॥18॥

Pada 4

तब ऊधौ हरि निकट बुलायौ । लिखि पाती दोउ हाथ दई तिहिं, औ मुख बचन सुनायौ ॥ ब्रजवासी जावत नारी नर, जल थल द्रुम बन पात । जो जिहिं बिधि तासौं तैसैंही, मिलि कहियौ कुसलात ॥ जो सुख स्याम तुमहिं तैं पावत, सो त्रिभुवन कहुँ नाहिं । सूरज प्रभु दई सौंह आपुनी, समुझत हौ मन माहिं ॥19॥

Pada 5

पहिलैं प्रनाम नँदराइ सौं । ता पाछैं मेरौ पालागन, कहियौ जसुमति माइ सौं ॥ बार एक तुम बरसाने लौं, जाइ सबै सुधि लीजौ । कहि बृषभानु महर सौं मेरौ, समाचार सब दीजौ ॥ श्रीदामाऽदि सकल ग्वालनि कौं, मेरौ कोतौ भेंटयौ । सुख संदेस सुनाइ सबनि कौं, दिन दिन कौ दुख मेट्यौ ॥ मित्र एक मन बसत हमारैं, ताहि मिलै सुख पाइहौ । करि समाधान नीकी बिधि, मोकौ माथौ नाइहौ ॥ डरपहु जनि तुम सघन कुंज मै, हैं तहँ के तरु भारी ॥ बृंदाबन मति रहति निरंतर, कबहुँ न होति निनारी ॥ ऊधौ सौं समुझाइ प्रगट करि, अपने मन की बीती । सूरदास स्वामी सौ छल सौं, कही सकल ब्रज-प्रीती ॥20॥

Pada 6

ऊधौ इतनौ कहियौ जाइ । हम आवैंगे दोऊ भैया, मैया जनि अकुलाइ ॥ याकौ बिलग बहुत हम मान्यौ, जो कहि पठयौ धाइ । वह गुन हमकौं कहा बिसरिहै, बड़े किए पय प्याइ ॥ अरु जब मिल्यौ नंद बाबा सौं, तब कहियौ समुझाइ । तौ लौ दुखी होन नहिं पावैं, धौरी धूमरि गाइ ॥ जद्यपि इहाँ अनेक भाँति सुख, तदपि रह्यौ नहिं जाइ । सूरदास देखौं ब्रजबासिनि, तबहीं हियौ सिराइ ॥21॥

Pada 7

नीकैं रहियौ जसुमति मैया । आवैंगे दिन चारि पाँच मैं, हम हलधर दोउ भैया ॥ नोई, बेंत,बिषान, बाँसुरी द्वार अबेर सबेरैं । लै जनि जाइ चुराइ राधिका, कछुक खिलौना मेरैं ॥ जा दिन तैं हम तुमतै बिछुरै, कोउ न कहत कन्हैया । उठि न सबेरे कियौ कलेऊ, साँझ न चीषी धैया ॥ कहिये कहा नंद बाबा सौं, जितौ निठुर मन कीन्हौ । सूरदास पहूँचाइ मधुपुरी, फेरि न सोधौ लौन्हौ ॥22॥

Pada 8

गहरु जनि लावहु गोकुल जाइ । तुमहिं बिना ब्याकुल हम ह्वै हैं, जदुपति करी चतुराइ ॥ अपनौ ही रथ तुरत मँगायौ, दियौ पुरत पलनाइ । अपने अंग अभूषन करि-करि, आपुन ही पहिराइ ॥ अपणौ सुकुट पितंबर अपनौ, देत सबै सुख पाइ । सूर स्याम तदरूप उपंगसुत, भृगुपद एक बचाइ ॥23॥

Pada 9

उद्धव को ब्रज भेजनाउद्धव ब्रज आगमन