उद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा कृष्ण उद्धव संवाद

उद्धव संदेश · 19 padas

ऊधौ जब ब्रज पहुँचे जाइ । तबकी कथा कृपा करि कहियै, हम सुनिहैं मन लाइ ॥ बाबा नंद जसोदा मैया, मिले कौन हित आइ ? कबहूँ सुरसति करत माखन की, किधौं रहे बिसराइ ॥ गोप सखा दधि-भात खात बन, अरु चाखते चखाइ । गऊ बच्च मुरली सुनि उमड़त , अब जु रहत किहँ भाइ ॥ गोपिन गृह ब्यवहार बिसारे, मुख सन्मुख सुख पाइ । पलक ओट निमि पर अनखातीं, यह दुख कहाँ समाइ ॥ एक सखी उनमैं जो राधा, लेति मनहिं जु चुराइ । सूर स्याम यह बार-बार कहि, मनहिं मन पछिताइ ॥1॥

Pada 1

जब मैं इहाँ तै जु गयौ । तब ब्रजराज सकल गोपी जन, आगैं होइ लयौ ॥ उतरे जाइ नंद बाबा कैं, सबही सोध लह्यौ । मेरी सौं मोसौं साँची कहि, मैया कहा कह्यौ ? बारंबार कुसल पूछी मोहिं, लै लै तुम्हरौ नाम । ज्यौं जल तृषा बढ़ी चातक चित, कृष्न-कृष्न बलराम ॥ सुंदर परम बिचित्र मनोहर, यह मुरली दै घाली । लई उठाइ सुख मानि सूर प्रभु, प्रीति आनि उर साली ॥2॥

Pada 2

सुनियै ब्रज की दसा गुसाई । रथ की धुजा पीत-पट भूषन , देखत ही उठि धाई ॥ जो तुम कही जोग की बातैं, सो हम सबै बताईं । श्रवन मूँदि गुन-कर्म तुम्हारे, प्रेम मगन मन गाईं ॥ औरौ कछू सँदेस सखी इक, कहत दूरि लौं आई । हुतौ कछू हमहूँ सौं नातौ, निपट कहा बिसराई ॥ सूरदास प्रभु बन विनोद करि, जे तुम गाइ चराई । ते गाइ अब ग्वाल न घेरत , मानौ भईं पराई ॥3॥

Pada 3

ब्रज के बिरही लोग दुखारे । बिन गोपाल ठगे से ठाढ़ै, अति दुर्बल तन कारे ॥ नंद, जसोदा मारग जोवति , निसि-दिन साँझ, सकारे । चहुँ-दिसि कान्ह-कान्ह कहि टेरत, अँसुवन बहत पनारे । गोपी, ग्वाल, गाइ, गो सुत सब, अतिहीं दीन बिचारे । सूरदास-प्रभु बिनु यौं देखियत, चंद बिना ज्यौं तारे ॥4॥

Pada 4

सुनहु स्याम वै सब ब्रज-बनिता बिरह तुम्हारैं भईं बावरी । नाहीं बात और कहि आवति , छाँड़ि जहाँ लगि कथा रावरी । कबहुँ कहतिं हरि माखन खायौ, कौन बसै या कठिन गाँव री । कबहुँ कहतिं हरि ऊखल बाँधे, घर-घर ते लै चलौ दाँवरी ॥ कबहुँ कहतिं ब्रजनाथ बन गए, जोवत-मग भई दृष्टि झाँवरी । कबहुँ कहतिं वा मुरली महियाँ लै-लै बोलत हमरौ नाव री ॥ कबहुँ कहतिं ब्रजनाथ साथ तैं, चंद उयौ है इहै ठाँव री । सूरदास प्रभु तुम्हरे दरस बिनु, बवह मूरति भईं साँवरी ॥5॥

Pada 5

फिरि ब्रज बसौ नंदकुमार । हरि तिहारे बिरह राधा,भई तन जरि छार ॥ बिन अभूषन मैं जु देखी, परी है बिकरार । एकई रट रटत भामिनि, पीव पीव पुकार ॥ सजल लोचन चुअत उनके, बहति जमुना धार । बिरह अगिनि प्रचंड उनकै, जरे हाथ लुहार ॥ दूसरी गति और नाहीं, रटति बारंबार । सूर प्रभु कौ नाम उनकैं, लकुट अंध अधार ॥6॥

Pada 6

ब्रज तैं द्वै रितु पै न गई । ग्रीषम अरु पावस प्रवीन हरि, तुम बिनु अधिक भई ॥ ऊर्ध उसास समीर नैन घन, सब जल जोग जुरे । बरषि प्रगट-कीन्हे दुख दादुर, हुते जो दूरि दुरे ॥ विषम वियोग जु वृष दिनकर सम, हिय अति उदौ करै । हरि-पद बिमुख भए सुनि सूरज, को तन ताप हरै ॥7॥

Pada 7

दिन दस घौष चलहु गोपाल । गाइनि की अवसेरि मिटावहु, मिलहु आपने ग्वाल ॥ नाचत नहीं मोर ता दिन तैं, रटत न बरषा-काल । मृग दुबरे दरसन बिनु, सुनत न बेनु रसाल ॥ बृंदावन हर्‌यौ होत न भावत , देख्यौ स्याम तमाल । सूरदास मैया अनाथ है, घर चलियै नँदलाल ॥8॥

Pada 8

ऊधौ भलो ज्ञान समुझायौ । तुम मोसौं अब कहा कहत हौं, मैं कहि कहा पठायौ ॥ कहवावत हौ बड़े चतुर पै, उहाँ न कछु कहि आयौ । सूरदास ब्रजवासिन कौ हित, हरि हिय माँह दुरायौ ॥9॥

Pada 9

मै समुझाई अति अपनौ सौ । तदपि उन्हैं परतीति न उपजी, सबै लख्यौ सपनौ सौ ॥ कही तुम्हारी सबै कही मैं, और कही कछु अपनी । स्रवननि बचन सुनत भइ उनकैं, ज्यौं घृत नाऐँ अगनी ॥ कोऊ कहौ बनाइ पचासक, उनकी बात जु एक । धन्य-धन्य ब्रजनारि बापुरी, जिनकौ और न टेक ॥ देखत उमग्यौ प्रेम इहाँ कौ, धरै रहे सब ऊलौ । सूर स्याम हौं रह्यौ थक्यौ सौ, ज्यौं मृग चौका भूलौ ॥10॥

Pada 10

बातें सुनहु तौ स्याम सुनाऊँ । जुबतिनि सौं कहि कथा जोग की, क्यौं न इतौ दुख पाऊँ ॥ हौं पचि एक कहौं निरगुन की, ताहू मैं अटकाऊँ । वै उमड़ैं बारिधि के जल ज्यौं, क्यौं हूँ थाह न पाऊँ ॥ कौन कौन कौ उत्तर दीजै, ताते भज्यौ अगाऊँ । वै मेरे सिर पटिया पारैं, कथा काहि उढ़ाऊँ ॥ एक आँधरौ, हिय की फूटी, दौरत पहिरि खराऊँ । सूर सकल षट दरसन वै, हौं बारइखरी पढ़ाऊँ ॥11॥

Pada 11

कहिबे मैं न कछू सक राखी । बुद्धि बिबेक अनुमान आपनैं, मुख आई सो भाषी ॥ हौं मरि एक कहौं पहरक मैं, वै पल माहिं अनेक । हारि मानि उठि चल्यौ दीन ह्वै, छाँड़ि आपनी टेक ॥ हौं पठयो कतहीं बेकाजै सठ मूरख जु अयानौ । तुमहिं बूझ बहुतै बातनि की, उहाँ जाहु तौ जानौं ॥ श्री मुख के सिखाए ग्रंथादिक, ते सब भए कहानी । एक होइ तौ उत्तर दीजै, सूर सु मठी उफानी ॥12॥

Pada 12

कोऊ सुनत न बात हमारी । मानैं कहा जोग जादवपति, प्रगट प्रेम ब्रजनारी ॥ कोऊ कहतिं हरि गए कुंज बन, सैन धाम वै देत । कोऊ कहतिं हरि गए कुंज बन, सैन धाम वै देत । कोऊ कहतिं इंद्र बरषा तकि, गिरि गोबर्धन लेत ॥ कोउ कहतिं नाग काली सुनि, हरि गए जमुना तीर । कोऊ कहतिं अघासुर मारन, गए संग बलबीर ॥ कोऊ कहत ग्वाल बालनि सँग, खेलत बनहिं लिकाने । सूर सुमिरि गुन णाथ तुम्हारे, कोऊ कह्यो न माने ॥13॥

Pada 13

माधौ जू कहा कहौं उनकी गति । देखत बनै कहत नहिं आवै, अति प्रतीति तुम तैं रति ॥ जद्यपि हौं षट मास रह्यौ ढिग, लही नहीं उनकी मति । तासौं कहौं सबै एकै बुधि, परमोघौ नहिं मानति ॥ तुम कृपाल करुनामय कहियत, तातैं मिलत कहा छति । सूरदास प्रभु सोई कीजै जातैं तुम पावहु पति ॥14॥

Pada 14

ब्रज मै एकै धरम रह्यौ । स्रुति सुमृति और बेद पुराननि, सबै गोविन्द कह्यौ । बालक बृद्ध तरुन अबलनि कौ, एक प्रेम निबह्यौ । सूरदास प्रभु छाड़ि जमुन जल, हरि की सरन गह्यौ ॥15॥

Pada 15

तब तैं इन सबहिनि सचु पायौ ॥ जब तैं हरि सँदेस तुम्हारौ, सुनत ताँवरौ आयौ ॥ फूले ब्याल दुरे ते प्रगटे, पवन पेट भरि खायौ ॥ खोले मृगनि चौक चरननि के, हुतौ जु जिय बिसरायौ ॥ ऊँचे बैठि बिहग सभा मैं, सुक बनराइ कहायौ ॥ किलकि-किलकि कुल सहित आपनैं, कोकिल मंगल गायौ ॥ निकसि कंदराहू तैं केहरि, पूँछ मूड़ पर ल्यायौ ॥ गहवर तैं गजराज आइकै, अँगहिं गर्व बढ़ायौ ॥ अब जनि गहरु करहु हो मोहन, जो चाहत हौ ज्यायौ । सूर बहुरि ह्वै है राधा कौं, सब बैरिनि कौ भायौ ॥16॥

Pada 16

माधो जू मैं अतिही सचु पायौ । अपनो जाति सँदेस ब्याज करि, ब्रज जन मिलन पठायौ ॥ छमाकरौ तौ करौं बीनती, उनहिं देखि जौ आयौ । श्रीमुख ग्यान पथ जौ उचर्‌यौ, सो पै कछु न सुहायौ ॥ सकल निगम सिद्धांत जन्म क्रम, स्यामा सहज सुनायौ । नहिं स्रुति, सेष, महेस प्रजापति, जो रस गोपिन गायो ॥ कटुक कथा लागी मोहिं मेरी, वह रस सिंधु उम्हायौ । उत तुम देखे और भाँति मैं, सकल तृषा जु बुझायौ ॥ तुम)हरौ अकत कथा तुम जानौ, हम जन नाहिं बसायो । सूर स्याम सुंदर यह सुनि कै, नैननि नीर बहायौ ॥17॥

Pada 17

ब्रज मैं संभ्रम मोहिं भयौ । तुम्हरौ ज्ञान संदेसौ प्रभु जू, सब जु भूलि गयौ ॥ तुमहीं सौं बालक किसोर बपु, मैं घर-घर प्रति देख्यौ । मुरलीधर घन स्याम मनोहर, अद्भुत नटवर पेख्यौ ॥ कौतुक रूप ग्वाल बृंदनि सँग, गाइ चरावन जात । साँझ प्रभातहिं गौ दोहन मिस, चोरी माखन खात ॥ नँद-नंदन अनेक लीला करि, गोपिनि चित्त चुरावत । वह सुख देखि जु नैन हमारे, ब्रह्म न देख्यौ भावत ॥ करि करुना उन दरसन दीन्हौं, मैं पचि जोग बह्यौ । छन मानहु षट्मास सूर प्रभु, देखत भूलि रह्यौ ॥18॥

Pada 18

ब्रज मैं एक अचंभौ देख्यौ । मोर मुकुट पीतांबर धारे, तुम गाइनि सँग पेख्यौ ॥ गोप बाल सँग धावत तुम्हारें, तुम घर घर प्रति जात । दूध दहीऽरु महीं लै ढ़रत, चोरी माखन खात ॥ गोपी सब मिलि पकरतिं तुमकौ, तुम छुड़ाइ कर भागत । सूर स्याम नित प्रति यह लीला, देखि देखि मन लागत ॥19॥

Pada 19

पूर्ण परिवर्तन तथा यशोदा संदेशश्रीकृष्ण वचन