श्रीकृष्ण वचन

उद्धव संदेश · 4 padas

सुनि ऊधौ मोहिं नैकू न बिसरत वै ब्रजवासी लोग । तुम उनकौ कछु भली न कीन्ही, निसि दिनदियौ वियोग ॥ जउ वसुदेव-देवकी मथुरा, सकल राज-सुख भोग । तदपि मनहिं बसत बंसी बट, बन जमुना संजोग ॥ वै उत रहत प्रेम अवलंबन, इत तैं पठयौ जोग । सूर उसाँस छाँडी भरि लोचन, बढ्यौ बिरह ज्वर सोग ॥1॥

Pada 1

ऊधौ मौंहि ब्रज बिसरत नाहीं । बृंदावन गोकुल बन उपवन, सघन कुंज की छाहीं ॥ प्रात समय माता जसुमति अरु, नंद देखि सुख पावत । माखन रोटी दह्यौ सजायौ, अति हित साथ खसावत ॥ गोपी ग्वाल बाल सँग खेलत, सब दिन हँसत सिरात । सूरदास धनि-धनि ब्रजबासी, जिनसौं हित जदु-तात ॥2॥

Pada 2

ऊधौ मोहिं ब्रज बिसरत नाहीं । हंस सुता की सुंदर कगरी, अरु कुंजनि की छाँही ॥ वै सुरभी वै बच्छ दोहनी, खरिक दुहावन जाहीं । ग्वाल-बाल मिलि करत कुलाहल, नाचत गहि गहि बाहीं ॥ यह मथुरा कंचन की नगरी, मनि-मुक्ताहल जाहीं । जबहिं सुरति आवति वा सुख की, जिय उमगत तन नाहीं ॥ अनगन भाँति करी बहु लीला, जसुदा नंद निबाहीं । सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, यह कहि कहि पछिताही ॥3॥

Pada 3

जो जन ऊधौ मोहिं न बिसारत, तिहिं न बिसारौं एक घरी । मेटौं जनम जनम के संकट, राखौं सुख आनंद भरी ॥ जो मोहिं भजै भजौं मैं ताकौ, यह परिमिति मेरे पाइँ परी । सदा सहाइ करैं वा जन की, गुप्त हुती सो प्रगट करी ॥ ज्यौ भारत भरुही के अंडा, राखे गज के घंट तरी । सूरदास ताहि डर काकौ, निसि बासर जौ जपत हरी ॥4॥

Pada 4

उद्धव मथुरा प्रत्यागमन तथा कृष्ण उद्धव संवादद्वारिका प्रमाण