बार सत्तरह जरासंध, मथुरा चढ़ि आयौ । गयो सो सब दिन हारि, जात घर बहुत लजायौ ॥ तब खिस्याइ कै कालजवन, अपनैं सँग ल्यायौ । हरि जू कियौ बिचार, सिंधु तट नगर बसायौ ॥ उग्रसेन सब लै कुटुंब, ता ठौर सिधायौ । अमर पुरी तैं अधिक, तहाँ सुख लोगनि पायौ ॥ कालजवन मुचुकुंदहिं सौं, हरि भसम करायौ । बहुरि आइ भरमाइ, अचल रिपु ताहि जरायौ ॥ जरासिंधु हू ह्वाँ तैं पुनि, निज देस सिधायौ । गए द्वारिका स्याम राम, जस सूरज गायौ ॥1॥
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