रुक्मिणी परिणय

द्वारिका चरित · 6 padas

हरि हरि हरि सुमिरन करौ । हरि चरनारबिंद उर धरौ ॥ हरि सुमिरन जब रुकमिनि कर्यौ । हरि करि कृपा ताहि तब बर्यौ ॥ कहौं सो कथा सुनौ चित लाइ । कहै सुनै सो रहै सुख पाइ ॥ कुंडिनपुर को भीषम राइ । बिश्नु भक्ति कौ तिहिं चित्त चाइ ॥ रुक्म आदि ताके सुत पाँच, रुकमिनि पुत्री हरि रँग राँच ॥ नृपति रुक्म सों कह्यौ बनाइ । कुँवरि जोग बर श्री जदुराइ । ।रुक्म रिसाइ पिता सौं कह्यौ । जदुपति ब्रज जो चिरत मह्यौ ॥ रुक्मनि कौं सिसुपालहि दीजै । करि विवाह जग मैं जस लीजै ॥ यह सुनि नृप नारी सौं कह्यौ । सुनि ताकौं अंतरगत दह्यौ ॥ रुक्म चँदेरी बिप्र पठायौ । ब्याह काज सिसुपाल बुलायौ ॥ सो बारात जोरि तहँ आयौ । श्री रुकमिनि के मन नहिं भायौ कह्यौ मेरे पति श्री भगवान । उनहिं बरौं कै तजौ परान ॥ यह निहचै करि पत्री लिखी । बोल्यौ बिप्र सहज इक सखी ॥ पाती दै कह्यौ बचन बाम । सूर जपति निसि दिन तुव नाम ॥ भीषण सुता रुकमिनी बाम । सूर जपति निसि दिन तुव नाम ॥1॥

Pada 1

द्विज पाती दै कहियौ स्यामहिं । कुंडिनपुर की कुँवरि रुकमनि, जपति तुम्हारे नामहिं ॥ पालागौं तुम जाहु द्वारिका, नंद-नंदनके धामहिं । कंचन, चीर-पटंबर देहौं, कर कंकन जु इनामहिं ॥ यह सिसुपाल असुचि अज्ञानी, हरत पराई बामहिं । सूर स्याम प्रभु तुम्हरौ भरोसौ, लाज करौ किन नामहिं ॥2॥

Pada 2

द्विज कहियौ जदुपति सौं बात बेद बिरुद्ध होत कुंडिनपुर, हंस के अंस काग नियरात ॥ जनि हमरे अपराध बिचारहु, कन्या लिख्यौ मेटि गुरु तात । तन आत्मा समरप्यौ तुमकौं, उपजि परी तातैं यह बात ॥ कृपा करहु उठि बेगि चढ़हु रथ, लगे समै आवहु परभात । कृष्न सिंह बलि धरी तुम्हारी, लैबै कौं जंबुक अकुलात ॥ तातैं मैं द्विज बेगि पठायौ, नेम धरम मरजादा जात । सूरदास सिसुपाल पानि गहै, पावक रचौं करौं आघात ॥3॥

Pada 3

सुनत हरि रुकमिनि कौ संदेस । चढ़ि रथ चलै बिप्र कौं सँग लै, कियौ न गेह प्रवेस ॥ बारंबार बिप्र कों पूछत, कुँवरि बचन सो सुनावत । दीनबंधु करुना निधान सुनि, नैन नीर भरि आवत ॥ कह्यौ हलधर सौं आवहु दल लै, मैं पहुँचत हौं धाइ । सूरज प्रभु कुंडिनपुर आए, बिप्र सो जाइ सुनाइ ॥4॥

Pada 4

रुक्मिनि देवी-मंदिर आई । धूप दीप पूजा-सामग्री, अली संग सब ल्याई ॥ रखवारी कौं बहुत महाभट, दीन्हे रुकम पठाई । ते सब सावधान भए चहुँ दिसि, पंछी तहाँ न जाई ॥ कुँवरि पूजि गौरी बिनती करी, वर देउ जादवराई । मैं पूजा कीन्ही इहिं कारन, गौरी सुनि मुसकाई ॥ पाइ प्रसाद अंबिका-मंदिर, रुकमिनि बाहर आई । सुभट देखि सुंदरता मोहे, धरनि गिरे मुरझाई ॥ इहिं अंतर जादौपति आए, रुकमिनि रथ बैठाई । सूरज प्रभु पहुँचे दल अपनैं, तब सुभटनि सुधि पाई ॥5॥

Pada 5

आवहु री मिलि मंगल गावहु । हरि रुकमिनी लिए आवत हैं, यह आनँद जदुकुलहिं सुनावहु ॥ बाँधहु बंदनवार मनोहर, कनक कलस भरि नीर धरावहु । दधि अच्छत फल फूल परम रुचि, आँगन चंदन चौक पुरवाहु ॥ कदली जूथ अनूप किसल दल, सुरँग सुमन लै मंडल छावहु । हरद दूब केसर मग छिरकहु; भेरी मृदंग निसान बजावहु ॥ जरासंध सिसुपाल नृपति तैं , जीते हैं उठि अरघ चढ़ावहु । बल समेत तन कुसल सूर प्रभु, आए हैं आरती बनावहु ॥6॥

Pada 6

द्वारिका प्रमाणबलभद्र ब्रज यात्रा