श्याम राम के गुन नित गाऊँ । स्याम राम ही सौं चित लाऊँ ॥ एक बार हरि निज पुर छाए । हलधर जी वृंदाबन गए रथ देखत लोगनि सुख पाए । जान्यौ स्याम राम दोउ आए । नंद जसोमति जब सुधि पाई । देह गेह की सुरति भुलाई ॥ आगैं ह्वै लैबै कौ धाए । हलधर दौरि चरन लपटाए ॥ बल कौ हित करि करें लगाए । दै असीस बोले या भाए ॥ तुम तौ बली करी बलराम । कहाँ रहे मन मोहन स्याम ॥ देखौ कान्हर की निठुराई । कबहूँ पाती हू न पठाई ॥ आपु जाइ ह्वाँ राजा भए । हमकौं बिछुरि बहुत दुख दए ॥ कहौ कबहुँ हमरी सुधि करत । हम तौ उन बिनु कहु दुख भरत ॥ कहा करैं ह्वाँ कोउ न जात । उन बिनु पल पल जुग सम जात । इहिं अंतर आए सब ग्वार । भेंटे सबनि जथा ब्यौहार ॥ नमस्कार काहूँ कौ कियौ । काहू कौं अंकम भरि लियौ ॥ पुनि गौपी जुरि मिलि सब आईं । तिन हित साथ असीस सुनाई ॥ हरि सुधि करि बुधि बिसराई । तिनकौ प्रेम कह्यौ नहिं जाई ॥ कोउ कहै हरि ब्याहीं बहु नार । तिनकौ बड्यौ बहुत परिवार ॥ उनकौं यह हम देंति असीस । सुख सौं जीवैं कोटि बरीस ॥ कौउ कहै हरि नाहीं हम चीन्ही । बिनु चीन्हैं उनकौं मन दीन्हौ ॥ निसि दिन रोवत हमैं बिछोइ । कहौ करैं अब कहा उपाइ ॥ कोउ कहै इहाँ चरावत गाइ । राजा भए द्वारिका जाइ ॥ काहे कौं वै आवैं इहाँ । भोग बिलास करत नित उहाँ ॥ कोऊ कहै हरि रिपु छै किए । अरु मित्रनि की बहु सुख दिए ॥ बिरह हमारौ कहँ रहि गयौ । जिन हमकौ अति हीं दुख दयौ ॥ कोउ कहै जे हरि की रानी । कौन भाँति हरि कौं पतियानी ॥ कोऊ चतुर नारि जो होइ । करै नहिं पतिआरौ सोइ ॥ कोउ कहे हम तुम कत पतियाईं । उनकें हित कुल लाज गवाईं ॥ हरि कछु ऐसौ टोना जानत । सबकौं मन अपनैं बस आनत ॥ कोउ कहै हरि हम बिसराईं । कहाँ कहैं कछु कह्यौ न जाई ॥ हरिकौं सुमिरि नयन जल ढारैं । नैंकु नहीं मन धीरज धारैं ॥ यह सुनि हलधर धीरज धारि । कह्यौ आइहैं हरि निरधारि ॥ जब बल यह संदेस सुनायौ । तब कछु इक मन धीरज आयौ ॥ बल तहँ बहुरि रहे द्वै मास । ब्रज बासिनि सौं करत बिलास ॥ सब सौं मिलि पुनि निजपुर आए । सूरदास हरि के गुन गाए ॥1॥
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