सुदामा चरित

द्वारिका चरित · 12 padas

कंत सिधारी मधुसूदन पै सुनियत हैं वे मीत तुम्हारे । बाल सखा अरु बिपति बिभंजन, संकट हरन मुकुंद मुरारे ॥ और जु अतुसय प्रीति देखियै, निज तन मन की प्रीति बिसारे । सरबस रीझि देत भक्तनि खौं, रंक नृपति काहूँ न बिचारे ॥ जद्यपि तुम संतोष भजत हौ, दरसन सुख तैं होत जु न्यारे । सूरदास प्रभु मिले सुदामा, सब सुख दै पुनि अटल न टारे ॥1॥

Pada 1

सुदामा सोचत पंथ चले । कैसे करि मिलिहैं मोहिं श्रीपति, भए तब सगुन भले ॥ पहुँच्यौ जाइ राजद्वारे पर, काहूँ नहिं अटकायौ । इत उत चितै धस्यौ मंदिर मैं, हरि कौ दरसन पायौ । मन मैं अति आनंद कियौ हरि, बाल-मीत पहिचान । धाए मिलन नगन पग आतुर, सूरजप्रभु भगवान ॥2॥

Pada 2

दूरिहिं तैं देख्यौ बलवीर । अपने बालसखा जु सुदामा, मलिन बसन अरु छीन सरीर ॥ पौढ़े हे परजंक परम रुचि ,रुकमिनि चैरि डुलावति तीर । उठि अकुलाइ अगमने लीन्हें, मिलत नैन भरि आए नीर ॥ निज आसन बैठारि स्याम-धन, पूछी कुसल कह्यौ मति धीर । ल्याए हौ सु देहु किन हमकौं, कहा दुरावन लागै चीर ॥ दरस परस हम भए सभाग, रही न मन मैं एकहु पीर । सूर सुमति तंदुल चाबत ही, कर पकर्यौ कमला भई धीर ॥3॥

Pada 3

ऐसी प्रीति की बलि जाउँ ॥ सिंहासन तजि चले मिलन कौं, सुनत सुदामा नाउँ ॥ कर जोरे हरि बिप्र जानि कै, हित करि चरन पखारे । अंकमाल दै मिले सुदामा , अर्धासन बैठारे ॥ अर्धंगी पूछति मोहन सौं, कैसे हितू तुम्हारे । तन अति छीन मलीन देखियत, पाउँ कहाँ तैं धारे ॥ संदीपन कैं हमऽरु सुदामा, पढ़े एक चटसार । सूर स्याम की कौन चलावै, भक्तनि कृपा अपार ॥4॥

Pada 4

गुरु-गृह हम जब बन कौं जात । जोरत हमरे बदलैं लकरी, सहि सब दुख निज गात ॥ एक दिवस बरषा भई बन मैं, रहि गए ताहीं ठौर । इनकी कृपा भयौ नहिं मोहिं श्रम, गुरु आए भऐं भोर ॥ सो दिन मोहिं बिसरत न सुदामा, जो कीन्हौ उपकार । प्रति उपकार कहा करौं सूरज, भाषत आप मुरार ॥5॥

Pada 5

सुदामा गृह कौं गमन कियौ । प्रगट बिप्र कौं कछु न जनायौ, मन मैं बहुत दियौ ॥ वेई चीर कुचील वहै बिधि, मोकौं कहा भयौ । धरिहौं कहा जाय तिय आगैं, भरि भरि लेत हियौ ॥ सो संतोष मानि मन हीं मन, आदर बहुत लियौ । सूरदास कीन्हे करनी बिनु, को पतियाइ बियौ ॥6॥

Pada 6

सुदामा मंदिर देखि डर्यौ । इहाँ हुती मेरी तनक मड़ैया, को नृप आनि छर्यौ ॥ सीस धुनै दोऊ कर मींड़ै, अंतर सोच पर्यौ । ठाढ़ी तिया जु मारग जोवै, ऊँचैं चरन धर्यौ ॥ तोहिं आदर्यौ त्रिभुवन कौ नायक, अब क्यों जात फिर्यौ । सूरदास प्रभु की यह लीला, दारिद दुःख हर्यौ ॥7॥

Pada 7

हौं फिरि बहुरि द्वारिका आयौ । समुझि न परी मोहिं मारग की, कोउ बूझौ न बतायो । कहिहैं स्याम सत इन छाँड़यौ, उतौ राँक ललचायौ । तृन की छाँह मिटी निधि माँगत , कौन दुखनि सौं छायौ ॥ सागर नहीं समीप कुमति कैं, बिधि कह अंत भ्रमायौ । चितवत चित्त बिचारत मेरी, मन सपनैं डर छायौ ॥ सुरतरु, दासी,दास, अस्व, गज, बिभौ बिनोद बनायौ । सूरज प्रभु नँद-सुवन मित्र ह्वै, भक्तनि लाड़ लड़ायौ ॥8॥

Pada 8

कहा भयौ मेरो गृह माटी कौ । हौं तो गयौ गुपालहिं भेंटन, और खरच तंदुल गाँठी कौ ॥ बिनु ग्रीवा कल सुभग न आन्यौ, हुतौ कमंडल दृढ़ काठी कौ । घुनौ बाँस जुत बुनो खटोला, काहु कौ पलँग कनक पाटी कौ ॥ नूतन छीरोदक जुवती पै, भूषन हुतौ न लोहह माटी कौ । सूरदास प्रभु कहा निहोरौ, मानत रंक त्रास टाटी कौ ॥9॥

Pada 9

भूलौ द्विज देखत अपनौ घर । औरहिं भाँति रचौ रचना रुचि , देखतही उपज्यौ हिरदै डर ॥ कै वह ठौर छुड़ाइ लियौ किहूँ, कोऊ आइ बस्यौ समरथ नर । कै हौं भूलि अनतहीं आयौ, यह कैलास जहाँ सुनियत हर ॥ बुध-जन कहत द्रुबल घातक विधि, सो हम आजु लही या पटतर । ज्यौं निलिनी बन छाँड़ि बसै जल, दाहै हेम जहाँ पानी-सर ॥ पाछै तैं तिय उतरि कह्यौ पति, चलिए द्वार गह्यौ कर सौं कर । सूरदास यह सब हित हरि को, द्वारैं, आइ भयौ जु कलपतर ॥10॥

Pada 10

कैसैं मिले पिय स्याम सँघाती । कहियै कत कौन बिधि परसे, बसन कुचील छीन अति गाती ॥ उठिकै दौरि अंक भरि लीन्हौ, मिलि पूछी इत-उत कुसलाती । पटतैं छोरि लिए कर तंदुल, हरि समीप रुकमिनी जहाँ ती ॥ देखि सकल तिय स्याम-सुंदर गुन, पट दै ओट सबै मुसक्यातीं । सूरदास प्रभु नवनिधि दीन्ही, देते और जो तिय न रिसातीं ॥11॥

Pada 11

हरि बिनु कौन दरिद्र हरै । कहत सुदामा सुनि सुंदरि, हरि मिलन न मन बिसरै ॥ और मित्र ऐसी गति देखत, को पहिचान करै । पति परैं कुसलात न बूझै, बात नहीं बिचरै ॥ उठि भेंटे हरि तंदुल लीन्हें मोहिं न बचन फुरै सूरदास लछि दई कृपा करि, टारी निधि न टरै ॥12॥

Pada 12

बलभद्र ब्रज यात्राब्रजनारी पथिक संवाद