ब्रजनारी पथिक संवाद

द्वारिका चरित · 11 padas

तब तैं बहुरि न कोऊ आयौ । वहै जु एक बेर ऊधौ सौं, कछु संदेसौ पायौ ॥ छिन छिन सुरति करत जदुपति की, परत न मन समुझायौ । गोकुलनाथ हमारैं हित लगि, लिखि हू क्यौं न पठायौ ॥ यहै विचार करौं धौं सजनी, इती गहरु क्यौं लायौ । सूर स्याम अब बेगि न मिलहू, मेघनि अंबर छायौ ॥1॥

Pada 1

बहुरौ हो ब्रज बात न चाली । वहै सु एक बेर ऊधौ कर, कमल नयन पाती दै घाली ॥ पथिक तिहारे पा लागति हौं, मथुरा जाहु जहाँ बनमाली । कहियौ प्रगट पुकारि द्वार ह्वै, कालिंदी फिरि आयौ काली ॥ तब वह कृपा हुती नँदनंदन , रुचि रुचि रसिक प्रीति प्रतिपाली । माँगत कुसुम देखि ऊँचे द्रुम, लेत उछंग गोद करि आली ॥ जब वह सुरति होति उर अंतर, लागति काम बान की भाली । सूरदास प्रभु प्रीति पुरातन , सुमिरत दुसह, सूल उर साली ॥2॥

Pada 2

तुम्हरे देस कागद मसि खूटी । भूख प्यास अरु नींद गई सब, बिरह लयौ तन लूटी ॥ दादुर मोर पपीहा बोले, अवधि भई सब झूठी । पाछैं आइ तुम कहा करौगे, जब तन जैहै छूटी ॥ राधा कहति सँदेस स्याम सौं, भई प्रीति की टूटि । सूरदास प्रभु तुम्हरे मिलन बिनु, सखी करति हैं कूटि ॥3॥

Pada 3

पथिक कह्यौ ब्रज जाइ, सुने हरि जात सिंधु तट । सुनि सब अंग भए सिथिल, गयौ नहिं बज्र हियौ फट ॥ नर नारी घर-घरनि सबै यह करतिं बिचारा । मिलिहैं कैसी भाँति हमैं अब नंद कुमारा ॥ निकट बसत हुती आस कियौ अब दूरि पयाना । बिना कृपा भगवान उपाइ न सूरज आना ॥4॥

Pada 4

नैना भए अनाथ हमारे । मदनगुपाल उहाँ तैं सजनी, सुनियत दूरि सिधारे ॥ वै समुद्र हम मीन बापुरी, कैसे जीवैं न्यारे । हम चातक वे जलद स्याम-घन, पियतिं सुधा-रस प्यारे ॥ मथुरा बसत आस दरसन की, जोइ नैन मग हारे । सूरदास हमकौ उलटी बिधि, मृतकहूँ तैं पुनि मारे ॥5॥

Pada 5

उती दूर तैं को आवै री । जासौं कहि संदेस पठाऊँ, सो कहि कहन कहा पावै री ॥ सिंधु कूल इक देस बसत है, देख्यो सुन्यौ न मन धावै री । तहँ नव-नगर जु रच्यौ नंद-सुत , द्वारावति पुरी कहावै री ॥ कंचन के बहु भवन मनोहर, रंक तहाँ नहिं त्रन छावै री । ह्वाँ के बासी लोगनि कौं क्यौं, ब्रज कौ बसिबौं मन भावै री ॥ बहु बिधि करतिं बिलाप बिरहनी, बहुत उपायनि चित लावैं री । कहा करौं करतिं बिलाप बिरहनी, बहुत उपायनि चित लावैं री । कहा करौं कहँ जाउँ सूर प्रभु, को हरि पिय पै पहुँचावै री ॥6॥

Pada 6

हौं कैसौं कै दरसन पाऊँ । सुनहु पथिक उहिं देस द्वारिका जौ तुम्हरैं सँग जाऊँ ॥ बाहर भीर बहुत भूपनि की, बूझत बदन दुराऊँ । भीतर भीर भोग भामिनि की, तिहि ठाँ काहि पठाऊँ ॥ बुधि बल जुक्ति जतन करि उहिं पुर, हरि पिय पै पहुँचाऊँ । अब बन बसि निसि कुंज रसिक बिनु, कौनैं दसा सुनाऊँ ॥ श्रम कै सूर जाउँ प्रभु पासहिं, मन सैं भलैं मनाऊँ । नव-निकोर मुख मुरलि बिना इन, नैननि कहा दिखाऊँ ॥7॥

Pada 7

तातें अति मरियत अपसोसनि । मथुरा हु तैं गए सखी री, अब हरि कारे कोसनि ॥ यह अचरज सु बड़ौ मेरैं जिय, यह छाड़नि वह पोषनि । निपट निकाम जाति हम छाँड़ी, ज्यौं कमान बिन गोसनि ॥ इक हरि के दरसन बिनु मरियत, अरु कुबिजा के ठोसनि । सूर सु जरनि उपजी जो, दूरि होति करि ओसनि ॥8॥

Pada 8

माई री कैसैं बनै हरि कौ ब्रज आवन । कहियत है मधुवन तैं सजनी, कियौ स्याम कहुँ अनत गबन । अगम जु पंथ दूरि दच्छिन दिसि, तहँ सुनियत सखि सिंधु लवन । अब हरि ह्वाँ परिवार सहित गए, मग मैं मार्यौ कालजवन ॥ निकट बसत मतिहीन भईं हम, मिलिहुँ न आईं सुत्यागि भवन । सूरदास तरसत मन निसि-दिन, जदुपति लौं लै जाइ कवन ॥9॥

Pada 9

सुनियत कहुँ द्वारिका बसाई दच्छिन दिशा तीर सागर कैं, कंचन कोटि गोमती खाई ॥ पंथ न चलै सँदेस न आवै, इतनी दूर नर कोऊ ना जाई । सत जोजन मथुरा तैं कहियत, यह सुधि एक पथिक पै पाई ॥ सब ब्रज दुखी नंद जसुदा हू, एक टक स्याम राम लव लाई । सूरदास प्रभु के दरसन बिनु, भई बिदित ब्रज काम दुहाई ॥10॥

Pada 10

बीर बटाऊ पाती लीजौ । जब तुम जाहु द्वारिका नगरी, हमरे गुपालहिं दीजौ ॥ रंगभूमि रमनीक मधुपुरी, रजधानी ब्रज की सुधि कीजौ । छार समुद्र छाँड़ि किन आवत, निर्मल जल जमुना कौ पीजौ ॥ या गोकुल की सकल ग्वालिनी, देतिं असीस बहुत जुग जीजौ । सूरदास प्रभु हमरे कोतैं, नंद नंदन के पाइँ परीजौ ॥ 11॥

Pada 11

सुदामा चरितरुक्मिनी कृष्ण संवाद