रुक्मिनी कृष्ण संवाद

द्वारिका चरित · 4 padas

रुकमिनि बूझति हैं गोपालहिं । कहौ बात अपने गोकुल की कितिक प्रीति ब्रजबालहिं ॥ तब तुम गाइ चरावन जाते, उर धरते बनमालहिं । कहा देखि रीझे राधा सौं, सुंदर नैन बिसालहिं ॥ इतनी सुनत नैन भरि आए, प्रेम बिबस नँदलालहिं । सूरदास प्रभु रहे मौन ह्वै, घोष बात जनि चालहिं ॥1॥

Pada 1

रुकमिनी मोहिं निमेष न बिसरत, वे ब्रजबासी लोग । हम उनसौं कछु भली न कीन्ही, निसि-दिन मरत बियोग ॥ जदपि कनक मनि रची द्वारिका, विषय सकल संभोग । तद्यपि मन जु हरत बंसी-बट, ललिता कैं संजोग ॥ मैं ऊधौ पठयौ गोपिनि पै, दैन संदेसौ जोग । सूरदास देखत उनकी गति, किहिं उपदेसै सोग ॥2॥

Pada 2

रुकमिनि ब्रज बिसरत नाहीं । वह क्रीड़ा वह केलि जमुन तट, सघन कदम की छाहीं ॥ गोप बधुनि की भुजा कंध धरि, बिहरत कुंजनि माहीं । और बिनोद कहाँ लगि बरनौं, बरनत बरनि न जाहीं ॥ जद्यपि निधान द्वारवति,गोकुल के सम नाहीं । सूरदास घनस्याम मनोहर, सुमिर-सुमिरि पछिताहीं ॥3॥

Pada 3

रुक्मिनि चलौ जन्म भूमि जाहिं । जद्यपि तुम्हरौ बिभव द्वारिका, मथुरा कैं सम नाहिं ॥ जमुना कैं तट गाइ चरावत, अमृत जल अँचवाहिं । कुंज केलि अरु भुजा कंध धरि, सीतल द्रुम की छाँहि ॥ सरस सुगंध मंद मलयानिल, बिहरत कुंजन माहिं । जो क्रीड़ा श्री बृंदावन मैं, तिहूँ लोक मैं नाहिं ॥ सुरभी ग्वाल नंद अरु जसिमति, मन चित तैं न टराहिं । सूरदास प्रभु चतुर सिरोमनि, तिनकी सेव कराहिं ॥4॥

Pada 4

ब्रजनारी पथिक संवादकुरुक्षेत्र में कृष्ण-ब्रजवासी भेंट