दोहावली
दोहावली
भाग-10 दोहा संख्या 451 से 500 तक
दोहा संख्या 451 से 460
कै जूझिबो कै बूझिबो दान कि काय कलेस।
चारि चारू परलोक पथ जथा जोग उपदेस।451।
451
पात पात को सींचिबो न करू सरग तरू हेत।
कुटिल कटुक फर फरैगो तुलसी करत अचेत।452।
452
गठिबँध ते परतीति बड़ि जेहिं सबको सब काज।
कहब थोर समुझब बहुत गाड़े बढ़त अनाज।453।
453
अपनो एपन निज हथा तिय पूजहिं निजज भीति।
फरइ सकल मन कामना तुलसी प्रीति प्रतीति।454।
454
बरषत करषत आपु जल हरषत अरघनि भानु।
तुलसी चाहत साधु सुर सब सनेह सनमानु।455।
455
श्रुति गुन कर गुन पु जुग मृग हय रेवती सखाउ।
देहि लेहि धन धरनि धरू गएहुँ न जाइहि काउ।456।
456
ऊगुन पूगुन बि अज कृ म आ भ अ मू गुनु साथ।
हरो धरो गाड़ो दियो धन फिरि चढ़इ न हाथ।457।
457
रबि हर दिसि गुन रस नयन मुनि प्रथमादिक बार।
तिथि सब काज नसावनी होइ कुजोग बिचार।458।
458
ससि सर नव दुइ छ दस गुन मुनि फल बसु हर भानु।
मेषादिक क्रम तें गनहि घात चंद्र जियँ जानु।459।
459
नकुल सुदरसन दरसनी छेमकरी चक चाष।
दस दिसि देखत सगुन सुभ पुजहिं मन अभिलाष।460।
460