दोहावली

दोहावली

भाग-10 दोहा संख्या 451 से 500 तक

दोहा संख्या 461 से 470 सुधा साधु सुरतरू सुमन सुफल सुहावनि बात। तुलसी सीतापति भगति सगुन सुमंगल सात।461।
461
भरत सत्रु सुदन लखन सहित सुमिरि रधुनाथं । करहु काज सुभ साज सब मिलिहि सुमंगल साथ।।462 ।
462
राम लखन कौसिक सहित सुमिरहु करहु पयान। लच्छि लाभ लै जगत जसु मंगल सगुन प्रमान।463।
463
अतुलित महिमा बेद की तुलसी किएँ बिचार। जो निंदित भयो बिदित बुद्ध अवतार।464।
464
बुध किसान सर बेद निज मतें खेत सब सींच । तुलसी कृषि लखि जानिबो उत्तम मध्यम नीच।465।
465
सहि कुबोल साँसति सकल अँगइ अनट अपमान। तुलसी धरम न परिहरिअ कहि करि गए सुजान।466।
466
अनहित भय परहित किएँ पर अनहित हित हानि। तुलसी चारू बिचारू भल करिअ काज सुनि जानि।467।
467
पुरूषारथ पूरब करम परमेस्वर परधान। तुलसी पैरत सरित ज्यों सबहिं काज अनुमान।468।
468
चलब नीति मग राम पग नेेह निबाहब नीक। तुलसी पहिरिअ सो बसन जो न पखारें फीक।469।
469
दोहा चारू बिचारू चलु परिहरि बाद बिबाद। सुकृत सीवँ स्वारथ अवधि परमारथ मरजाद।470।
470
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