दोहावली
दोहावली
भाग-10 दोहा संख्या 451 से 500 तक
दोहा संख्या 471 से 480
तुलसी सो समरथ सुमति सुकृती साधु सयान।
जो बिचारि ब्यवहरइ जग खरच लाभ अनुमान।471।
471
जाय जोग जग छेम बिनु तुलसी के हित राखि।
बिनुऽपराध भृगुपति नहुष बेनु बृकासुर साखि।472।
472
बड़ि प्रतीति गठिबंध तें बड़ो जोग तें छेमं।
बड़ो सुसेवक साइँ तें बड़ो नेम तें प्रेम।473।
473
सिस्य सखा सेवक सचिव सुतिय सिखावन साँच।
सुनि समुझिअ पुनि परिहरिअ पर मन रंजन पाँच।।474।
474
नगर नारि भोजन सचिव सेवक सखा अगार।
सरस परिहरें रंग रस निरस बिषाद बिकार।475।
475
तूठहिं निज रूचि काज करि रूठहिं काज बिगारि।
तीय तनय सेवक सखा मन के कंटक चारि।476।
476
दीरघ रोगी दारिदी कटुबच लोलुप लोग।
तुलसी प्रान समान तउ होहिं निरादर जोग।477।
477
पाही खेती लगन बट रिन कुब्याज मग खेत।
बैर बड़े सों आपने किए पाँच दुख हेत।478।
478
धाइ लगै लोहा ललकि खैंचि लेइ नइ नीचु।
समरथ पापी सों बयर जानि बिसाही मीचु।479।
479
सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग।
सोचिअ जती प्रपंच रत बिगत बिबेक बिराग।480।
480