दोहावली

दोहावली

भाग-10 दोहा संख्या 451 से 500 तक

दोहा संख्या 481 से 490 तुलसी स्वारथ सामुहो परमारथ तन पीठि। अंध कहें दुख पाइहै डिठिआरो केहि डीठि।481।
481
बिन आँखिन की पानहीं पहिचानत लखि पाय। चारि नयन के नारि नर सूझत मीचु न माय।482।
482
जौ पै मूढ़ उपदेस के होते जोग जहान। क्यों न सुजोधन बोध कै आए स्याम सुजान।483।
483
(सोरठा) फूलइ फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद। मूरूख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम।484।
484
(दोहा) रीझि आपनी बेझि पर खीझि बिचार बिहीन। ते उपदेस न मानहीं मोह महोदधि मीन।485।
485
अनसमुझें अनुसोचनो अवसि समुझिऐ आयु। तुलसी आपु न समुझिऐ पल पल पर परितापु।486।
486
कूप खनत मंदिर जरत आएँ धारि बबूर। बवहिं नवहिं निज काज सिर कुमति सिरोमनि कूर।487।
487
निडर ईस ते बीस कै बीस बाहु सो होइ। गयो कहैं सुमति सब भयो कुमति कह कोइ।488।
488
जो सुनि समुझि अनीति रत जागत रहै जु सोइ। उपदेसिबो जगाइबो तुलसी उचित न होय।489।
489
बहु सुत बहु रूचि बहु बचन बहु अचार ब्यवहार। इनकेा भलो मनाइबो यह अग्यान अपार।490।
490
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