दोहावली
दोहावली
भाग-10 दोहा संख्या 451 से 500 तक
दोहा संख्या 491 से 500
लोगनि भलो मनाव जो भलो होन की आस।
करत गगन केा गेंडुआ सो सठ तुलसीदास।491।
491
अपजस जोग कि जानकी मनि चोरी की कान्ह।
तुलसी जु पै गुमान को होतो कछू उपाउ।
तौ कि जानकिहि जानि जियँ परिहरते रधुराउ।493।
493
मागि मधुकरी खात ते सोवत गोड़ पसारि।
पाप प्रतिष्ठा बढ़ि परी ताते बाढ़ी रारि।494।
494
तुलसी भेड़ी की धँसनि जड़ जनता सनमान।
उपजत ही अभिमान भो खोवत मूढ़ अपान।495।
495
लही आँखि कब आँधरे बाँझ पूत कब ल्याइ।
कब कोढ़ी काया लही जग बहराइच जाइ।496।
496
तुलसी निरभय होत नर सुनिअत सुरपुर जाइ।
सो गति लखि ब्रत अछत तनु सुख संपति गति पाइ।497।
497
तुलसी तोरत तीर तरू बक हित हंस बिडारि।
बिगत नलिन अलि मलिन जल सुरसरिहू बढ़िआरि।498।
498
अधिकारी बस औसरा भलेउ जानिबे मंद।
सुधा सदन बसु बारहें चउथें चउथिउ चंद।499।
499
त्रिबिध एक बिधि प्रभु अनुग अवसर करहिं कुठाट।
सूधें टेढ़े सम बिषम सब महँ बारह बाट।500।
500