दोहावली

दोहावली

भाग-11 दोहा संख्या 501 से 550 तक

दोहा संख्या 501 से 510 प्रभु तें प्रभु गन दुखद लखि प्रजहिं सँभारै राउ। कर तें होत कृपानको कठिन घोर घन घाउ।501।
501
व्यालहु ते बिकराल बड़ ब्यालफेन जियँ जानु। वहि के खाये मरत हैं वहि खाए बिनु प्रानु ।502।
502
कारन तें कारजु कठिन होइ देासु नहिं मोर। कुलिस अस्थि तें उपल तेें लोह कराल कठोर।503।
503
काल बिलोकत ईस रूख भानु काल अनुहारि। रबिहिं राउ राजहिं प्रजा बुध ब्यवहरहिं बिचारि।504।
504
जथ अमल पावन पवन पाइ कुसंग सुसंग। कहिअ कुबास सुबास तिमि काल महीस प्रसंग।505।
505
भलेहु चलत पथ पोच भय नृप नियोग नय नेम। सुतिय सुभूपति भूषिअत लोह सँवारित हेम।506।
506
माली भानु किसान सम नीति निपुन नरपाल। प्रजा भाग बस होहिंगे कबहुँ कबहुँ कलिकाल।507।
507
बरसत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ। तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ।508।
508
बरसत हरषत लोग सब करषत लखै न कोइ। तुलसी प्रजा सुभाग ते भूप भानु सो होइ।508।
508
सुधा सुनाज कुनाज फल आम असन सम जानि। सुप्रभु प्रजा हित लेहिं कर सामादिक अनुमानि।509।
509
पाके पकए बिटप दल उत्तम मध्यम नीच। फल नर लहैं नरेस त्यों करि बिचारि मन बीच।510।
510
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