दोहावली

दोहावली

भाग-11 दोहा संख्या 501 से 550 तक

दोहा संख्या 511 से 520 रीझि खीझि गुरू देत सिख सखा सुसाहिब साधु। तोरि खाइ फल होइ भलु तरू काटें अपराधु।511।
511
धरनि धेनु चारितु चरन प्रजा सुबच्छ पेन्हाइ। हाथ कछू नहिं लागिहै किएँ गोड़ की गाइ।।512।
512
चढें बधूरें चंग ज्यों ग्यान ज्यों सोक समाज। करम धरम सुख संपदा त्यों जानिबे कुराज।513।
513
कंटक करि करि परत गिरि साखा सहस खजूरिं । मरहिं कुनृप करि कुनय सों कुचालि भव भूरि।514।
514
काल तोपची तुपक महि दारू अनय कराल। पाप पलीता कठिन गुरू गोला पुहुमी पाल।515।
515
भूमि रूचिर रावन सभा अंगद पद महिपाल। धरम रामनय सीय बल अचल होेत सुभ काल।516।
516
प्रीति राम पद नीति रति धरम प्रतीति सुभायँ। प्रभुहिं न प्रभुता परिहरै कबहुँ बचन मन कायँं।517।
517
कर के कर मन के मनहिं बचन बचन गुन जानि। भूपहि भूलि न परिहरै बिजय बिभूति सयानि।518।
518
गोली बान सुमंत्र सर समुझि उलटि मन देखु। उत्तम मध्यम नीच प्रभु बचन बिचारि बिसेषु।519।
519
सत्रु सयानो सलिल ज्यों राख सीस रिपु नाव। बूड़त लखि पग डरत लखि चपरि चहूँ दिसि धाव।520।
520
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