दोहावली

दोहावली

भाग-11 दोहा संख्या 501 से 550 तक

दोहा संख्या 521 से 530 रैयत राज समाज घर तन धन धरम सुबाहु। सांत सुसचिवन सौंपि सुख बिलसइ नित नरनाहु।ं521। मुखिआ मुखु सो चाहिऐ सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक। पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक।522।
522
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ। तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ।523।
523
सचिव बैद गुर तीनि जौं प्रिय बोलहिं भय आस। राज धर्म तन तीनि कर होहि बेगिहीं नास।524।
524
रसना मन्त्री दसन जन तोष पोष निज काज। प्रभु कर सेन पदादिका बालक राज समाज।525।
525
लकडी डौआ करछुली सरस काज अनुहारि। सुप्रभु संग्रहहिं परिहरहिं सेवक सखा बिचारि।। प्रभु समीप छोटे बड़े रहत निबल बलवान। तुलसी प्रगट बिलोकिऐ कर अँगुली अनुमान।527।
527
साहब तें सेवक बड़ो जो निज धरम सुजान। राम बाँधि उतरे उदधि लाँधि गए हनुमान।528।
528
तुलसी भल बरतरू बढ़त निज मूलहिं अनुकूल। सबहि भाँति सब कहँ सुखद दलनि फलनि बिनु फूल।529।
529
सधन सगुन सधरम सगन सबल सुसाइँ महीप। तुलसी जे अभिमान बिनु ते तिभुवन के दीप।530।
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