दोहावली

दोहावली

भाग-11 दोहा संख्या 501 से 550 तक

दोहा संख्या 531 से 540 तुलसी निज करतूति बिनु मुकुत जात जब कोइ। गयो अजामिल लोक हरि नाम सक्यो नहिं धोइ।531।
531
बड़ो गहे ते होत बड़ ज्यों बावन कर दंड। श्रीप्रभु के सँग सों बढ़ो गयो अखिल ब्रह्मांड।532।
532
तुलसी दान जो देेत हैं जल में हाथ उठाइ। प्रतिग्राही जीवै नहीं दात नरकै जाइ।533।
533
आपन छोड़ो साथ जब ता दिन हितू न कोइ। तुलसी अंबुज अंबु बिनु तरनि तासु रिपु होइ।534।
534
उरबी परि कलहीन होइ ऊपर कलाप्रधान। तुलसी देखु कलाप गति साधन घन पहिचान।535।
535
तुलसी संगति पोच की सुजनहि होति म-दानि। ज्यो हरि रूप सुताहि तें कीनि गोहारी आनि।536।
536
कलि कुचालि सुभ मति हरनि सरलै दंडै चक्र। तुलसी यह निहचय भइ। बाढ़ि लेति नव बक्र।537।
537
गो खग खे खग बारि खग तीनों महिं बिसेक। तुलसी पीवैं फिरि चलैं रहैं फिरि चलैं रहैं फिरैं सँग एक।538।
538
साधन समय सुसिद्धि लहि उभय मूल अनुकूल। तुलसी तीनिउ समय सम ते महि मंगल मूल।539।
539
मातु पिता गुरू स्वामि सिख सिर धरि करहिं सुभायँ। लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरू जनमु जग जायँ।540।
540
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