दोहावली
दोहावली
भाग-11 दोहा संख्या 501 से 550 तक
दोहा संख्या 541 से 550
अनुचित उचित बिचारू तजि जे पालहिं पितु बैन।
ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन।541।
541
सहज अपावनि नारि पति सेवत सुभ गति लहइ।
जसु गावत श्रुति चारि अजहुँ तुलसिका हरिहि प्रिय।542।
542
सरनागत कहूँ जे तअहिं निज अनहित अनुमानि।
ते नर पावँर पापमय तिन्हहि बिलोकत हानि।543।
543
तुलसी तृन जलकूल को निरबल निपट निकाज।
कै राखै कै सँग चलै बाँह गहे की लाज।544।
544
रामायन अनुहरत सिख जग भयो भारत रीति।
तुलसी सठ की को सुनै कलि कुचालि पर प्रीति।545।
545
पात पात केै सींचिबो बरी बरी कै लोन।
तुलसी खोटें चतुरपन कलि डहके कहु को न।546।
546
प्रीति सगाई सकल बिधि बनिज उपायँ अनेक।
कल बल छल कलि मल मलिन डहकत एकहि एक।547।
547
दंभ सहित कलि धरम सब छल समेत ब्यवहार।
स्वारथ सहित सनेह सब रूचि अनुहरत अचार।548।
548
चोर चतुर बटमार नट प्रभु भैंडुआ भंड।
सब भच्छक परमारथी कलि सुपंथ पाषंड।549।
549
असुभ भेष सभूसन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं।550।
550