दोहावली

दोहावली

भाग-3 दोहा संख्या 101 से 150 तक

दोहा संख्या 131 से 140 तब लगि कुसल न जीव कहुँ सपनेहुँ मन विश्राम। जब लगि भजत न राम कहुँ सोक धाम तजि काम।131।
131
बिनु सतसंग न हरिकथा तेहि बिनु मोह न भाग। मोह गएँ बिनु रामपद होइ न दृढ़ अनुराग।132।
132
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु । राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु।133।
133
अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल। भजहु राम रघुबीर करूनाकर सुंदर सुखद।134।
134
भाव बस्य भगवान सुख निधान करूना भवन। तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन।135।
135
कहहिं बिमलमति संत बेद पुरान बिचारि अस। द्रवहिं जानकी कंत तब छूटै संसार दुख।136।
136
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु। गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु।137।
137
रामचंद्र के भजन बिनु जेा चह पद निर्बान। ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान।138।
138
जरउ सो संपति सदन सुखु सुह्दय मातु पितु भाइ। सनमुख होत जो रामपद करइ न सहस सहाइ।139।
139
स्ेाइ साधु गुरू समुझि सिखि राम भगति थिरताई । लरिकाई को पैरिबो तुलसी बिसरि न जाई।140।
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