दोहावली
दोहावली
भाग-3 दोहा संख्या 101 से 150 तक
दोहा संख्या 141 से 150
श्री सबहि कहावत राम के सबहि राम की आस।
राम कहहिं जेहि आपनो तेहि भजु तुलसीदास।141।
141
जेहि सरीर रति राम सों सोइ आदरहिं सुजान।
रूद्रदेह तजि नेहबस बान भे हनुमान।142।
142
जानि राम सेवा सरस समुझि करब अनुमान।
पुरूषा ते सेवक भए हर ते भे हनुमान।143।
143
तुलसी रघुबर सेवकहि खल डाटत मन माखि।
बाजराज के बालकहि लवा दिखावत आँखि।144।
144
रावन रिपुके दास तें कायर करहिं कुचालि।
रवर दूषन मारीच ज्यों नीच जाहिंगे कालि।145।
145
पुन्य पाप जस अजस के भावी भाजन भूरि।
संकट तुलसीदास को राम करहिंगे दूरि।146।
146
खेलत बालक ब्याल सँग मेलत पावक हाथ।
तुलसी सिसु पितु मातु ज्यों राखत सिय रघुनाथ।147।
147
तुलसी दिन भल साहु कहँ भली चोर कहँ राति।
निसि बासन ता कहँ भलेा मानै राम इतानि।148।
148
तुलसी जाने सुति समुझि कृपासिंधु रघुराज।
महँगे मनि कंचन किए सौंधें जग जल नाज।149।
149
सेवा सील सनेह बस करि परिहरि प्रिय लोग ।
तुलसी ते सब राम सों सुखद सँजोग बियोग।150।
150