दोहावली

दोहावली

भाग-4 दोहा संख्या 151 से 200 तक

दोहा संख्या 151 से 160 चारि चहत मानस अगम चनक चारि को लाहु। चारि परिहरें चारि को दानि चारि चख चाहु।151।
151
सूधे मन सूधे बचन सूधी सब करतूति। तुलसी सूधी सकल बिधि रघुबर प्रेम प्रसूति।152।
152
बेष बिषद बोलनि मधुर मन कटु करम मलीन। तुलसी राम न पाइऐ भएँ बिषय जल मीन।153।
153
बषन बेष तें जो बनइ से बिगरइ परिनाम। तुलसी मन तें जो बनइ बनी बनाई राम।154।
154
नीच मीचु लै जाइ जो राम रजायसु पाइ। तौ तुलसी तेरो भलो न तु अनभलो अघाइ।155।
155
जाति हीन अघ जन्म महि मुक्त कीन्हि असि नारि। महामंद मन सुख चहसि ऐसे प्रभुहि बिसारि।।156।
156
बंधु बधू रत कहि कियो बचन निरूत्तर बालि। तुलसी प्रभु सुग्रीव की चितइ न कछू कुचालि।157।
157
बालि बली बलसालि दलि सखा कीन्ह कपिराज। तुलसी राम कृपालु को बिरद गरीब निवाज।158।
158
कहा बिभीषन लै मिल्यो कहा बिगार्यो बालि। तुलसी प्रभु सरनागतहि सब िदन आए पालि।159।
159
तुलसी कोसलपाल सो को सरनागत पाल। भज्यो बिभीषन बंधु भय भ्ंाज्यो दारिद काल।160।
160
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