दोहावली
दोहावली
भाग-4 दोहा संख्या 151 से 200 तक
दोहा संख्या 161 से 170
श्री कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि।
चित्त खगेस राम कर समुझि परइ कहु काहि।161।
161
बालकन भूषन फल असन तृन सज्या द्रुम प्रीति।
तिन्ह समयन लंका दई यह रघुबर की रीति।162।
162
जो संपति सिव रावनहि दीन्हि दिएँ दस माथ।
सोइ संपदा बिभीषनहि सकुचि दीन्हि रघुनाथ।163।
163
अबिचल राज बिभीषनहि दीन्ह राम रघुराज।
अजहुँ बिराजत लंक पर तुलसी सहित समाज।164।
164
कहा विभीषन लै मिल्यो कहा दियो रघुनाथ।
तुलसी यह जाने बिना मूढ़ मीजिहैं हाथ।165।
165
बैरि बंधु निसिचर अधम तज्यो न भरें कलंक।
झूठें अघ सिय परिहरी तुलसी साइँ ससंक।166।
166
तेहि समाज कियो कठिन पन जेहिं तौल्यो कैलास।
तुलसी प्रभु महिमा कहैंा सेवक को बिस्वास।167।
167
सभा सभासद निरखि पट पकरि उठायों हाथ।
तुलसी कियो इगारहों बसन बेस जदुनाथ।168।
168
त्राहि तीनि कह्यो द्रोपदी तुलसी राज समाज।
प्रथम बढ़े पट बिय बिकल चहत चकित निज काज।169।
169
सुख जीवन सब कोउ चहत सुख जीवन हरि हाथ।
तुलसी दाता मागनेउ देखिअत अबुध अनाथ।170।
170