दोहावली

दोहावली

भाग-4 दोहा संख्या 151 से 200 तक

दोहा संख्या 171 से 180 कृपिन देइ पाइअ परो बिनु साधें सिधि होइ। सीतापति सनमुख समुझि जो कीजै सुभ सोइ।171।
171
दंडक बन पावन करन चरन सरोज प्रभाउ। ऊसर जामहिं खल तरहिं होइ रंक ते राउ।172।
172
बिनहीं रितु तरूबर फलत सिला द्रवति जल जोर। राम लखन सिय करि कृपा जब चितवत जेहि ओर।173।
173
सिला सुतिय भइ गिरि तरे मृतक जिए जग जान। राम अनुग्रह सगुन सुभ सुलभ सकल कल्यान।174।
174
सिला साप मोचन चरन सुमिरहु तुलसीदास। तजहु सोच संकट मिटहिं पूजहिं मनकी आस।175।
175
मुए जिआउ भालु कपि अवध बिप्रको पूत। सुमिरहु तुलसी ताहि तू जाको मारूति दूत।176।
176
काल करम गुन दोष जगज ीव तिहारे हाथ । तुलसी रघुबर राबरो जानु जानकीनाथ।177।
177
रोग निकर तनु जरठपनु तुलसी संग कुलोग। राम कृपा लै पालिए दीन पालिबे जोग। 178।
178
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर । अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर।179।
179
भव भुअंग तुलसी नकुल डसत ग्यान हरि लेत। चित्रकूट एक औषधी चितवत होत सचेत।180।
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