दोहावली
दोहावली
भाग-4 दोहा संख्या 151 से 200 तक
दोहा संख्या 181 से 190
श्री हौं हु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास।
साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास।181।
181
राम राज राजत सकल धरम निरत नर नारि।
राग न रोष न दोष दुख सुलभ पदारथ चारि।।182।
182
राम राज संतोष सुख घर बन सकल सुपास ।
तरू सुरतरू सुरधेनु महि अभिमत भोग बिलास।183।
183
खेती बानि बिद्या बनिज सेवा सिलिप सुकाज।
तुलसी सुरतरू सरिस सब सुफल राम के राज।184।
184
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र के राज।185।
185
कोंपें सोच न पोच कर करिअ निहोर न काज।
तुलसी परमिति प्रीति की रीति राम कें राज।186
186
मुकर निरखि मुख रामभ्रू गनत गुनहि दै दोष।
तुलसी से सठ सेवकन्हि लखि जनि परहिं सरोष।187।
187
सहसनाम मुनि भनित सुनि तुलसी बल्लभ नाम।
सकुचित हियँ हँसि निरखि सिय धरम धुरंधर राम।188।
188
गौतम तिय गति सुरति करि नहिं परसकत पग पानि।
मन बिहँसे रघुबंसमनि प्रीति अलौकिक जानि।189।
189
तुलसी बिलसत नखत निसि सरद सुधाकर साथ।
मुकुता झालरि झलक जनु राम सुजसु सिसु हाथ।190।
190