दोहावली
दोहावली
भाग-5 दोहा संख्या 201 से 250 तक
दोहा संख्या 201 से 210
हित उदास रघुबर बिरह बिकल सकल नर नारि।
भरत लखन सिय गति समुझि प्रभु चख सदा सुबारि।201।
201
सीय सुमित्रा सुवन गति भरत सनेह सुभाउ।
काहिबे को सारद सरस जनिबे को रघुराउ।202।
202
जानी राम न कहि सके भरत लखन सिय प्रीति।
सो सुनि गुनि तुलसी कहत हठ सठता की रीति।203।
203
सम बिधि समरथ सकल कह सहि साँसति दिन राति ।
भलो निबाहेउ सुनि समुझि स्वामिधर्म सब भाँति।204।
204
भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरिहर पद पाइ।
कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ।205।
205
संपति चकई भरत चक मुनि आयस खेलवार।
तेहि निसि आश्रम पिंजाराँ राखे भा भिनुसार।206।
206
सघन चोर मग मुदित मन धनी गही ज्यों फेंट।
त्यों सुग्रीव बिभीषनहिं भई भरतकी भेंट।207।
207
राम सराहे भरत उठि मिले राम सम जानि।
तदपि बिभीषन कीसपति तुलसी गरत गलानि।।208।
208
भरत स्याम तन राम सम सब गुन रूप् निधान।
सेवक सुखदायक सुलभ सुमिरत सब कल्यान।209।
209
ललित लखन मुरति मधुर सुमिरहु सहित सनेह।
सुख संपति कीरति बिजय सगुन सुमंगल गेह।210।
210