दोहावली
दोहावली
भाग-6 दोहा संख्या 251 से 300 तक
दोहा संख्या 281 से 290
चढ़त न चातक चित कबहुँ प्रिय पयोद के दोष ।
तुलसी प्रेम प्योधि की ताते नाम न जोख।281।
281
बरसि परूष पाहन पयद पंख करौ टुक टूक।
तुलसी परी न चाहिऐ चतुर चातकहि चूक।।282।
282
उपल बरसि गरजत तरजि डारत कुलिस कठोर।
चितव कि चातक मेघ तजि कबहुँ दूसरी ओर।283।
283
पबि पाहन दामिनी गरज झरि झकोर खरि खीझि।
रोष न प्रीतम दोष लखि तुलसी रागहि रीझि।284।
284
मान राखिबो माँगिबो पिय सों नित नव नेहु।
तुलसी तीनिउ तब फबैं जौं चातक मन लेहु।285।
285
तुलसी चातक की फबै मान राखिबो प्रेम।
बक्र बुंद लखि स्वातिहू निदरि निबाहत नेम।286।
286
तुलसी चातक माँगनेा एक उक घन दानि।
देत जो भू भाजन भरत लेेत जतो घँूटक पानि।287।
287
तीनि लोक तिहुँ काल जस चातक ही के माथ।
तुसी जासु न दीनता सुनी दूसरे नाथ।288।
288
प्रीति पपीहा पयद की प्रगट नई पहिचानि।
जाचक जगत कनाउड़ेा कियो कनौड़ा दानि।289।
289
नहिं जाचक नहिं सेग्रही सीस नाइ नहिं लेइ।
ऐसे मानी मागनेहि को बारिद बिन देइ।290।
290