दोहावली

दोहावली

भाग-6 दोहा संख्या 251 से 300 तक

दोहा संख्या 291 से 300 को को न ज्यायो जगत में जीवन दायक दानि। भयो कनोड़ो जाचकहि पयद प्रेम पहिचानि।291।
291
साधन साँसति सब सहत सबहि सुखद फल लाहु। तुलसी चातक जलद की रिझि बूझि बुध काहु।292।
292
चातक जीवल दायकहि जीवन समयँ सुरीति। तुलसी अलख न लखि परै चातक प्रीति प्रतीति।293।
293
जीव चराचर जहँ लगे हैं सब को हित मेह । तुलसी चातक मन बस्यो घन सों सहत सनेह।294।
294
डोलत बिपुल बिहंग बन पिअत पोखरिन बारि। सुजस धवल चातक नवल तुही भुवन दस चारि।295।
295
मुख मीठे मानस मलिन कोकिल मोर चकोर। सुजस धवल चातक नवल रह्यो भुवन भति तोर।296।
296
बास बेसि बोलनि चलनि मानस मंजु मराल। तुलसी चातक प्रेम की कीरति बिसद बिसाल।297।
297
प्रेम न परखिअ परूष्पन प्यद सिखावन एह। जग कह चातक पातकी ऊसर बरसै मेह।298।
298
होइ न चातक पातकी जीवन दानि न मूढ़। तुलसी गति प्रहलाद की समुझि प्रेम पथ गूढ़।299।
299
गरज आपनी सबन को गरज करत उर आनि। तुलसी चातक चतुर भो जाचक जानि सुदानि।300।
300
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