दोहावली

दोहावली

भाग-7 दोहा संख्या 301 से 350 तक

दोहा संख्या 301 से 310 चरग चंगु गत चातकहि नेम प्रेम की पीर । तुलसी परबस हाड़ पर परिहैं पुहुमी नीर।301।
301
बध्यो बधिक पर्यो पुन्य जल उलटि उठाई चोंच। तुलसी चातक प्रेमपट मरतहुँ लगी न खोंच।302।
302
अंड फोरि कियो चेटुवा तुष पर्यो नीर निहारि। गहि चंगुल चातक चतुर डार्यो बाहिर बारि।।303।
303
तुलसी चातक देति सिख सुतहिं बारहीं बार। तात न तर्पन कीजिऐ बिना बारिधर धार।304।
304
जिअत न नाई नारि चातक घन तजि दूसरहि। सुरसरिहू को बारि मरत माँगेउ अरध जल।305।
305
सुनु रे तुलसीदस प्यास पपीहहि प्रेम की। परिहरि चारिउ मास जो अँचवै जल स्वाति को।306।
306
जाचै बारह मास पिऐ पपीहा स्वाति जल । जान्यों तुलसीदास जोगवत नेेही नेह मन।307।
307
तुलसीं के मत चातकहि केवल प्रेम पिआस । पिअत स्वाति जल जान जग जाँचत बाारह मास।308।
308
आलबाल मुकुताहलनि हिय सनेह तरू मूल। होइ हेतु चित चातकहि स्वाति सलिलु अनुकूल।309।
309
उष्न काल अरू देह खिन मग पंथी तन ऊख। चातक बतियाँ न रूचीं अन जल सींचे रूख।310।
310
Section 6 · 5Section 7 · 2