दोहावली
दोहावली
भाग-7 दोहा संख्या 301 से 350 तक
दोहा संख्या 310 से 320
अन जल सींचे रूख की छाया तें बरू घाम।
तुलसी चातक बहुत हैं यह प्रबीन को काम।311।
311
एक अंग जो सनेहता निसि दिन चातक नेह।
तुलसी जासेंा हित जगै वहि अहार वहि देह।312।
312
बिबि रसना तनु स्याम है बंक चननि बिष खानि।
तुलसी जस श्रवननि सुन्यो समरप्यो आनि।313।
313
आपु ब्याध को रूप धरि कुहौ कुरंगहि राग।
तुलसी जो मृग मन मुरै परै प्रेम पट दाग।314।
314
तुलसी मनि निज दुति फनिहि ब्याधहि देउ दिखाइ।
बिछुरत होइ न आँधरो ताते प्रेम न जाइ।315।
315
जरत तुहिन लखि बनज बन रबि दै पीठि पराउ।
उदय बिकस अथवत सकुच मिटै न सहज सुभाउ।316।
316
देउ आपनें हाथ जल मीनहि माहुर घोरि।
तुलसी जिये जो बारि बिनु तौ तु देहि कबि खोरि।317।
317
मकर उरग दादुर कमठ जल जीवन जल गेह।
तुलसी एकै मीन को है साँचिलो सनेह। 318।
318
तुलसी मिटे न मरि मिटेहुँ साँचो सहज सनेह।
मेारसिखा बिनु मूरिहूँ पलुहत गरजत मेह।319।
319
सुलभ प्रीति प्रीतम सबै कहत करत सब कोइ।
तुलसी मीन पुनीत ते त्रिभुवन बड़ो न कोइ।320।
320