दोहावली
दोहावली
भाग-7 दोहा संख्या 301 से 350 तक
दोहा संख्या 320 से 330
तुलसी जप तप नेम ब्रत सब सबहीं तें होइ।
लहै बड़ाई देवता इष्टदेव जब होइ।321।
321
कुदिन हितू सो हित सुदिन हित अनहित किन होइ।
ससि छबि हर रबि सदन तउ मित्र कहत सब कोइ।322।
322
कै लघुकै बड़ मीत भल सम सनेह दुख सोइ।
तुलसी ज्यों घृत मधु सरिस मिलें महाबिष होइ।323।
323
मान्य मीन सेा सुख चहैं सो न छुऐ छल छाहँ।
ससि त्रिसंकु कैकेइ गति लखि तुलसी मन माहँ।324।
324
कहिअ कठिन कृत कोमलहुँ हित हठि होइ सहाइ।
पलक पानि पर ओड़ियत समुझि कुघाइ सुघाइ।325।
325
तुलसी बैर सनेह दोउ रहित बिलेाचन चारि।
सुरा सेवरा आदरहिं निंदहिं सुरसरि बारि।326।
326
रूचै मागनेहि मागिबेा तुलसी दानिहि दानु।
आलस अनख न आचरज प्रेम पिहानी जानु।327।
327
अमिय गारि गारेउ गरल गारि कीन्ह करतार।
प्रेम बैर की जननि जुग जानहिं बुध न गवाँर।328।
328
सदा न जे सुमिरत रहहिं मिलि न कहरिं प्रिय बैन।
ते पै तिन्ह के जाहिं घर जिन्ह के हिएँ न नैन।329।
329
हित पुनीत सब स्वाथिहिं अरि असुद्ध बिनु चाड़।
निज मुख मानिक सम दसन भूमि परे ते हाड़।330।
330