दोहावली

दोहावली

भाग-7 दोहा संख्या 301 से 350 तक

दोहा संख्या 330 से 340 माखी काक उलूक बक दारुर से भये लोग। भले ते सुक कपक मोरसे कोउ न प्रेम पथ जोग।331।
331
हृदय कपट बर बेष धरि बचन कहहिं गढ़ि छोलि। अब के लोग मयूर ज्यों क्यों मिलिए मन खोलि।332।
332
चरन चोंच लोचन रँगौ चलौ मराली चाल। छीर नीर बिबरन समय बक उघरत तेहि काल।। मिलै जो सरलहि सरल ह्वै कुटिल न सहज बिहाइ। सो सहेतु ज्यों बक्र गति ब्याल न बिलहिं समाइ।। कूसधन सखहि न देब दुख मुएहुँ न मागब नीच। तुलसी सज्जन की रहनि पावकपानी बीच।।335।
335
संग सरल कुटिलहि भएँ हरि हर करहिं निबाहु । ग्रह गनती गनि चतुर बिधि कियो उदर बिनु राहु।। नीच निखई रनहिं तजइ सज्जनहू कें संग। तुलसी चंदन बिटप बसि बिनु बिष भए न भुअंग।337।
337
भलो भलाइहि पै लहै लहइ निचाइहि नीचु। सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु।338।
338
मिथ्या माहुर सज्जनहि गरल सम साँच। तुलसी छुअत पराइ ज्यों पारद पावक आँच।339।
339
संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ। कहहिं संत कबि कोबिद श्रुति पुरान कदग्रंथ।340।
340
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