दोहावली
दोहावली
भाग-7 दोहा संख्या 301 से 350 तक
दोहा संख्या 340 से 350
स्ुकृत न सुकृती परिहरइ कपट न कपटी नीच।
मरत सिखावन देइ चले गीधराज मारीच।341।
341
सुजन सुतरू बन ऊख सम खल टंकिका रूखन।
परहित बनहित लागि सब साँसति सहज समान।342।
342
पिअहिं सुमन रस अलि बिटप काटि केाल फल खात।
तुलसी तरूजीवी जुगल सुमति कुमति की बात।343।
343
अवसर कौड़ी जो चुकै बहुरि दिएँ का लाख।
दुइज न चंदा दखिऐ उदौ कहा भरि पाख।344।
344
ग्यान अनभले को सबहि भले भलेहू काउ।
सींग सूँड़ रद लूम नख करत जीव जड़ घाउ।345।
345
तुलसी जग जीवन अहित कतहुँ कोउ हित जानि।
सोषक भानु कृसानु महि पवन एक घन दानि।346।
346
सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतुति कराल।
जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल।347।
347
जलचर थल चर गगनचर देव दनुज नर नाग।
उत्तम मध्यम अधम खल दस गुन बढ़त बिभाग।348।
348
बलि मिस देखे देवता कर क मिस मानव देव।
मुए मार सुबिचार हत स्वारथ साधन एव।349।
349
सुजन कहत भल पोच पथ पापि न परखइ भेद।
करमनास सुरसरित मिस बिधि निषेध बद बेद।350।
350