दोहावली
दोहावली
भाग-8 दोहा संख्या 351 से 400 तक
दोहा संख्या 350 से 360
मनि भाजन मधु पारई पूरन अमी निहारि।
का छाँड़िअ का संग्रहिअ कहहु बिबेक बिचारि।351।
351
उत्तम मध्यम नीच गति पाहन सिकता पानि।
प्रीति परिच्छा तिहुन की बैर बितिक्रम जानि।352।
352
पुन्य प्रीति पति प्रापतिउ परमारथ पथ पाँच।
लहहिं सुजन परिहरहिं खल सुनहु सिखवन साँच।353।
353
नीच निरादरहीं सुखद आदर सुखद बिसाल।
करदी बदरी बिटप गति पेखहु पनस रसाल। 354।
354
तुलसी अपनो आचरन भलो न लागत कासु।
तेहि न बसात जो खात नित लहसुनहू को बासु।355।
355
बुध से बिबेकी बिमलमति जिन्ह कें रोष न राग।
सुहृदय सराहत साधु जेहि तुलसी ताकेा भाग।356।
356
आपु आपु कहँ सब भलो अपने कहँ कोइ कोइ।
तुलसी सब कहँ जो भलो सुजन सराहिअ सोइ।357।
357
तुलसी भलो सुसंग तें पोच कुसंगति सोइ।
नाउ किंनरी तीर असि लोह बिलोकहु लोइ।358।
358
गुरू संगति गुरू होइ सेा लघ्ज्ञु संगति लघुनाम ।
चार पदारथ में गनैं नकि द्वारहू काम।359।
359
तुलसी गुरू लघुतालहत लघुसंगति परिनाम ं।
देवी देव पुकाअित नीच नारि नर नाम।360।
360