दोहावली
दोहावली
भाग-8 दोहा संख्या 351 से 400 तक
दोहा संख्या 360 से 370
तुलसी किएँ कुसंग थिति होहिं दाहिने बाम।
कहि सुनि सकुचिअ सूम खल गत हरि संकर नाम।361।
361
बसि कुसंग वह सुजनता ताकी आस निरास।
तीरथहू केा नाम भे गया मगह के पास।362।
362
राम कृपाँ तुलसी सुलभ गंग सुसंग समान।
जो जल परै जो जन मिलै कीजै आपु समान।363।
363
ग्रह भेषज जल पनन पट पाइ कुजोग सुजोग।
होहिं कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग।364।
364
जनम जोग में जानियत जग बिचित्र गति देखि।
तुलसी आखर अंक रस रंग बिभेद बिसेषि।365।
365
आखर जोरि बिचार करू सुमति अंक लिखि लिखि लेखु।
जोग कुजोग सुजोग मय जग गति समुझि बिसेषु।366।
366
करू बिचार चलु सुपथ भल आदि मध्य परिनाम।
उलटि जपें ‘जारा मरा’ सूधें ‘राजा राम’।367।
367
होइ भले कें अनभलो होइ दानि कें सूम।
होइ कपूत सपूत कें ज्यों पावक में धूम।368।
368
जड़ चेतन गुन दोष मय बिस्व कीन्ह करतार।
संत हंस गुन गहहि पय परिहरि बारि बिकार।369।
369
पाट कीट तें होइ तेहि तें पटंबर रूचिर।
कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम।370।
370