दोहावली
दोहावली
भाग-8 दोहा संख्या 351 से 400 तक
दोहा संख्या 370 से 380
जो जो जेहिं रस मगन तहँ सेा मुदित मन मानि।
रसगुन दोष बिचारिबो रसिक रीति पहिचानि।371।
371
सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह।
ससि सोषक पोषक समुझि जगज स अपजस दीन्ह।372।
372
लोक बेदहू लौं दगो नाम भले को पोच।
धर्मराज जम गाज पबि कहत सकोच न सोच।373।
373
बिरूचि परखिऐ सुजन जन राखि परखिऐ मंद।
बड़वानल सोषत उदधि हरष बढ़ावत चंद।374।
374
प्रभु सनमुख भएँ नीच नर होत निपट बिकराल।
रबिरूख लखि दरपन फटिक उगिलत ज्वालाजाल।375।
375
प्रभु समीप गत सुजन जन होत सुखद सुबिचार।
लवन जलधि जीवन जलद बरषत सुधा सुबारि।376।
376
नीच निरावहिं निरस तरू तुलसी सींचहिं ऊख।
पोषत पयद समान सब बिष पियूष के रूख।377।
377
बरषि बिस्व हरषित कहत हरत ताप अघ प्यास।
तुलसी दोष न जलद को जो जल जरै जवास।378।
378
अमर दानि जाचक मरहिं मरि मरि फिरि फिरि लेहिं।
तुलसी जाचक पातकी दातहि दूषन देहिं।379।
379
लखि गयंद लै चलत भजि स्वान सुखानो हाड़।
गज गुन मोल अहार बल महिमा जान कि राड़।380।
380